विकास के लिए गंगा को उसके उद्गम स्थल पर ही बांधने वाली परियोजनाओं के खिलाफ देश के कई हिस्सों में गुस्से का इजहार हुआ है। आस्थावानों की नजर में यह देश की सांस्कृतिक धारा से छेड़छाड़ है, जिसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, वहीं पर्यावरण प्रेमियों ने इसे पारिस्थितिकी से खतरनाक खिलवाड़ करार दिया है। पर्यावरणविद जेडी अग्रवाल के आमरण अनशन ने खास तौर पर इस मुद्दे की आ॓र सबका ध्यान दिलाया है। गंगा को बचाने की तमाम योजनाओं और उससे जुड़े सरोकारों को रेखांकित करता इस बार का हस्तक्षेप-
प्रवीण झा
अपने उद्गमस्थल गोमुख (उत्तराखंड) से लेकर बंगाल की खाड़ी तक गंगा समुद्रतल से गोमुख की 7,010 मीटर ऊंचाई से चलकर बंगाल की खाड़ी तक 2,525 किलोमीटर की यात्रा तय कर सागर में अपना अस्तित्व विलीन कर देती है। देवप्रयाग तक गंगा भागीरथी के नाम से जानी जाती है। देव प्रयाग में अलकनन्दा, मंदाकिनी के संगम के बाद ही भागीरथी गंगा कहलाती है। यहीं से गंगा का जलस्तर बढ़ जाता है। पर्यावरण वैज्ञानिक डा. रितेश जोशी बताते हैं कि विगत वर्षों के आंकड़े गवाह हैं कि गंगा के किनारे करीब 100 शहर व कस्बे बसे हैं। इनमें उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में 26, बिहार में 15 एवं 59 शहर या कस्बे पश्चिमी बंगाल में हैं। इनमें आधे नगरों की आबादी एक लाख से ऊपर है। देश की सिंचित भूमि का लगभग 43 प्रतिशत भूभाग गंगा से ही सिंचित होता है। लेकिन गंगा किनारे नगरों का प्रदूषित जल व कचरा गंगा में बहाए जाने से गंगा जैसे-जैसे अपने प्रवाह मार्ग पर आगे बढ़ती है और अधिक प्रदूषित होती जाती है।
गंगाजल की गुणवत्ता बरकरार रखने व उचित प्रबंधन के लिए भारत सरकार ने 1985-86 में केंद्रीय गंगा प्राधिकरण का गठन किया। उक्त प्राधिकरण के तहत मुख्य रूप से गंगा किनारे के कई शहरों में एसटीपी के साथ ही गंगाजल परीक्षण का कार्य किया जा रहा है। वर्तमान में प्राधिकरण ‘गंगा एक्शन प्लान’ के नाम से काम कर रहा है। कर्ई नगरों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित तो हुए लेकिन इनकी जलशोधन क्षमता कम होने के कारण अब भी बिना शोधत हुआ सीवर का सैकड़ों एमएलडी पानी सीधे गंगा में ही बहाया जा रहा है। डा. जोशी बताते हैं कि नदियों पर बांध बनाकर विघुत उत्पादन करना बुरा नहीं है लेकिन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि पर्यावरण संतुलन भी बना रहे। उन्होंने कहा कि फिलहाल उत्तराखंड में कई प्रमुख विघुत परियोजनाएं कार्यरत हैं। इन परियोजनाओं में तपोवन-विष्णुगाड़, मनेरी भाली, टीएचडीसी, चीला आदि शामिल हैं। बांध में बंधे जल को पुन:उसके प्राकृतिक प्रवाह मार्ग पर छोड़ने से बहाव की रफ्तार, खनिज टकराव की प्रक्रिया से गुजरते हुए पानी अपनी गुणवत्ता को रिजनरेट कर लेता है, बावजूद इसके गुणवत्ता प्रभावित होती ही है। यही नहीं बांधों के कारण कई प्रकार की मछलियों का अस्तित्व भी संकटमय हो जाता है जो अपने प्राकृत आवास से हजारों मील दूर जाकर प्रजनन करती हैं। उत्तराखंड में पाई जाने वाली महाशीर मछली भी इस समय संकटापन्न है।
जिला मत्स्य अधिकारी एचके पुरोहित ने बताया कि गंगा पर बांध बनने से रूके पानी से महाशीर जैसी मछली की ब्रिडिंग व फीडिंग प्रभावित हो सकती है। उन्होंने बताया कि रूके पानी में प्राय: आक्सीजन की मात्रा कम होकर पानी का तापमान बढ़ जाता है। ग्लोबल टेस्टिंग एंड रिसर्च सेंटर के प्रशिक्षु वैज्ञानिक डा. कमल किशोर ने बताया कि त्योहारों व विभिन्न स्नान पर्वों पर गंगा का प्रदूषण स्तर सामान्य से दोगुना देखा गया है। सामान्यत:गंगाजल की बॉयोलोजिकल आक्सीजन डिमांड 0.29 के आसपास रहती है जबकि प्रदूषण अधिक होने पर यह 6.5 के आसपास मापी गई है।
रविवार, 3 अगस्त 2008
गंगा से पंगा
गंगा तुम बहती हो क्यों?
भूपेंद्र हजारिका का यह लोकप्रिय गीत बहुत प्रतीकात्मक है। जब भी महिला सशक्तिकरण की बात होती है तब न जाने क्यों नदियां याद आने लगती हैं। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि नदियां महिलाओं के स्नेह, ममता, उदारता चित्र की ही तो प्रतीक हैं। इसलिए भारत में नदियों को महिला नामों से ही संबोधित किया गया।
वे बोल्गा, थेम्स, दजला-फरात नील (नाइल) की तरह सिर्फ नदियां नहीं हैं बल्कि वे पूजनीय हैं, सम्माननीय हैं बिलकुल उसी तरह जिस तरह घर की पालक, पोषक महिला एक मां के रूप में होती है।
पर समय के साथ-साथ जिस तरह महिलाओं के शोषण, उन पर अत्याचार, उनको दबाने, छलने की सारी कुचेष्टाएं समाज ने कीं। वैसा का वैसा बर्ताव नदियों के साथ भी हुआ। इस बार जब गंगा के दर्शन किए तो यकीन जानिये कि आचमन तो क्या पैर डुबोने का भी मन नहीं हुआ। पहाड़ों की गोद छोड़कर जब गतिमान प्रवाह से इठलाती गंगा हरिद्वार में बहती है (थी) तब वह दृश्य न जाने कितनी बार स्मृति में कौंधकर निमंत्रण देता रहता था, पर गंगा का कितना शोषण, उस पर कितना अनाचार हो रहा है। भीड़ की भीड़ का रेला गंगा में डुबकियां लगाता है, प्लास्टिक की थैलियों में हार-फूल चढ़ाकर अपनी स्वार्थी निजी मनौतियां पूरी करता है। उसके किनारे बैठकर आम खाकर उसके छिलके बहाता है।
गंगा के चारों ओर प्लास्टिक की चद्दरें तनकर सैकड़ों गुमटियां खड़ी हो गई हैं। उनमें सस्ता प्लास्टिक का सामान, सस्ते भजनों के कैसेट और निहायत ही निम्नस्तरीय सामग्री भरी पड़ी है। इतने दुकानदार जिनके पास छत के नाम पर सिर्फ एक टापरा है अपने परिवार सहित रोज नित्य कर्म कहां करते होंगे? उनकी अस्वच्छता गंगा में ही तो बहती होगी।
गंगा पापियों के पाप धोते-धोते मैली नहीं हुई बल्कि गंगा और इसी तरह की अन्य नदियों का शोषण, दोहन करने की मानसिकता ने गंगा और अन्य नदियों के स्वच्छ सफेद जल को मटमैला कर दिया है। उसके किनारे बैठकर यही विचार आते रहे कि क्या भागीरथ इसी दिन के लिए गंगा को स्वर्ग से उतारकर लाए थे? क्या इसी दिन के लिए प्राणी का शरीर छोड़ते समय उसके मुंह में गंगाजल डाला जाता है?
जिस दिन गंगाजल मटमैला होते-होते एक उथला जल हो गया तब हमारी अस्थियां कहां जाएंगी? मुक्ति कैसे होगी? इस समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वह जिन्हें शक्ति स्वरूपा देवी कहकर महिमा मंडित करता है उनकी गर्भ में हत्या करता है। जिन्हें वह जननी, मां कहकर संबोधित करता है, उनको स्वार्थवश बेसहारा छोड़ देता है। जब-जब महिला सशक्तिकरण की बात हो, उनके शोषण का और उन पर होने वाली हिंसा, दमन, अनाचरों की बात की जाए तब-तब नदियों के सशक्तिकरण, उनके आरक्षण, उनकी स्वच्छता और संरक्षण की भी बात हो। महिला आयोग के साथ नदी आयोग भी संलग्न हो। एक महिला ही नदी की पीड़ा समझ सकती है।