
—शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
ग्रीष्म ऋ़तु प्रारंभ होते ही कैलाश पर्वत पर ध्यानमग्न भगवान शंकर की समाधि अचानक खुली, तब गर्मी से व्याकुल प्रतीक्षारत पार्वती जी ने शिव जी से कहा, ''हे भोले नाथ! आप तो सर्वज्ञ हैं, सब के मन की बात जानते हैं। फिर भी शिकायत करना पत्नी का अधिकार और उसे ध्यानपूर्वक सुनना पति की विवशता है। अत: हे त्रिपुरारि! मेरे प्रश्नों को ध्यान से सुनिए और उनका समाधान भी कीजिए।''
''सबसे पहले तो यह बताइए कि अचानक हिमालय का बर्फ़ कहाँ चला गया? और हमेशा ठंडे रहने वाले इस स्थान पर गर्मी कहाँ से आ गई? और इस भीषण गर्मी से बचने के लिए हम लोग क्या करें? कहाँ जाएँ? क्यों कि आप एक तो वस्त्र बहुत कम ही पहनते हैं और दूसरे समाधि में बैठ जाते हैं। तीसरे जटाओं में गंगा और मस्तक पर शीतल चंद्रमा धारण किए हैं इसलिए आपको तो गर्मी लगती नहीं है। किंतु मैं इस गर्मी में कैसे समय व्यतीत करती हूँ मैं ही जानती हूँ।''
शिव जी ने पार्वती की शिकायत के गंभीरता को समझते हुए हमेशा की तरह शांतिपूर्वक मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, ''हे प्रिय गिरिजे! मैं समझता हूँ कि तुम हिमालय की पुत्री होने के कारण शीतल प्रकृति की हो। तुम्हें ज़रा-सी भी गर्मी असह्य होती है इसीलिए तो मैंने तुम्हारे पितृगृह में ही रहने का फैसला किया था। श्वसुराल में रहना कितना अपमान जनक होता है? यह जानते हुए भी तुम्हारी सुविधा को ध्यान में रखते हुए मैंने घर जँमाई बनकर यहाँ रहना स्वीकार किया। मुझे क्या पता था कि हिमालय में भी गर्मी हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी?''
''मनुष्य नामक प्राणी के अप्राकृतिक कार्यों की वजह से यह दिन भी देखना पड़ेगा? मनुष्य के कारण? यह मनुष्य कहाँ से आ गया हिमालय में?'' पार्वती ने पूरक प्रश्न किया।
''हाँ देवि! यह विषम परिस्थिति मनुष्य के अविवेक पूर्ण क्रियाओं से ही उत्पन्न हुई है। उसने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, कल-कारखानों के निर्माण और आधुनिक वाहनों के प्रयोग से प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। ग्रीन हाउस प्रभाव से ग्लोबल वार्मिंग और ओजोन रक्षा कवच टूट जाने के फलस्वरुप हिमालय का बर्फ़ पिघल गया है और यहाँ भी गर्मी उत्पन्न हो रही है।'' शिव जी ने गर्मी का वैज्ञानिक विश्लेषण किया।
''मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है, ये ग्लोबल-म्लोबल वार्मिंग क्या होता है? ज़रा आप विस्तार से बताइए। यह तो पहले मैंने कभी सुना ही नहीं है।'' पार्वती जी ने अपनी अज्ञानता पर आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा।
शिव जी ने हिमालय से पिघलकर बहते हुए बर्फ़ को देखकर चिंता प्रकट करते हुए पार्वती से कहा, ''हे पार्वती तुम अभी इस समस्या से परिचित नहीं हो और न ही इसके भयावह परिणाम को जानती हो। इसलिए सावधान होकर सुनो, समझो और इस भूलोक को महाप्रलय से बचाने का प्रयत्न करो।''
ब्रम्हा जी ने संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करके मनुष्य नामक प्राणी को बुद्धि देकर जो भूल की है यह उसी का परिणाम है। उसने सृष्टि की सारी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करके रख दिया है। वह सृष्टि का संचालन अपने हाथों में लेना चाहता है। उसने पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँचों महाभूतों का दोहन करके नवीन-नवीन अप्राकृतिक वस्तुओं का निर्माण करके एक ओर जहाँ इन महाभूतों को प्रदूषित किया है, वहीं पूरी प्रकृति की सुंदर व्यवस्था को विकृत कर दिया है। अन्य सब जीव-जंतु तो प्रकृति की व्यवस्था के अंतर्गत रहते हैं पर मनुष्य नई-नई व्यवस्था बनाने में सारी व्यवस्था चौपट कर देता है।
ब्रम्हा जी ने इतने वृक्षों की सृष्टि की थी जो मनुष्यों द्वारा उत्सर्जित 'कार्बनडाई आक्साइड' नामक गैस को गृहण कर समस्त प्राणियों के जीवन के लिए अत्यावश्यक प्राणवायु अर्थात 'आक्सीजन' नामक गैस के रूप में बदल सकें। जिससे सृष्टि की संपूर्ण व्यवस्था सुचारु रूप से चलती थी। किंतु मनुष्य ने अपनी जनसंख्या में जितनी भारी वृद्धि की उतनी ही वृक्षों को काट-काट कर उनकी संख्या कम कर दी। फलस्वरूप पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा और फिर कुछ कसर रही तो कार्बनडाई आक्साइड उत्सर्जित करने वाले अनेक वाहन और कारखाने तैयार कर लिए। बिजली उत्पादन और अनेक उद्योगों के द्वारा मीथेन नाइट्रस आक्साइड क्लोरो-लोरो कार्बन जैसी ग्रीन हाउस गैसों को बड़ी मात्रा में उत्सर्जित करके विश्व के तापमान में अत्यधिक वृद्धि कर डाली। उसी का परिणाम है कि हिमालय का बर्फ़ पिघलता जा रहा है और समुद्र का जल स्तर निरंतर बढता जा रहा है। यदि इस ग्लोबल वार्मिंग को नहीं रोका गया तो प्रलय अब दूर नहीं है। शिव जी ने चिंतित मुद्रा में पार्वती को समझाया। लेकिन यह तो मनुष्य का आत्महत्या का प्रयास दिखाई देता है? और आप उसे बुद्धिमान कह रहे है? पार्वती जी ने मनुष्य की बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए पूछा। हाँ देवि! यह मनुष्य वही कर रहा है जो कभी रावण ने किया था। वह रावण को हर साल जलाता है पर काम पूरे उसी के कर रहा है।'' शिव जी ने मनुष्य पर क्रोध प्रकट करते हुए कहा।
''हे प्रभो! आप तो आशुतोष हैं कृपा करके इस ग्लोबल वार्मिंग से बचने का कुछ उपाय बताइए जिससे यह दुनिया बच सके और पृथ्वी के सभी प्राणी सुखपूर्वक रह सकें। पार्वती जी ने प्रार्थना की। शिव जी ने नेत्र बंद करके उपाय बताते हुए कहा, ''हे प्रिये! यदि प्रत्येक मनुष्य प्रतिवर्ष नए-नए वृक्ष लगाए और परंपरागत उर्जा के स्थान पर अक्षय उर्जा का उपयोग करे। डीज़ल-पेट्रोल से चलने वाले वाहनों को छोड़कर पैदल या सायकल से चले तो सर्वनाश ये बचा जा सकता है।
उद्योगों की स्थापना से पहले ही उससे निकलने वाले हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को नदियों में मिलने से रोका जाए। पर्यावरण संरक्षण को सर्वाधिक महत्व दिया जाए तो मनुष्य को अभी अवसर है। सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहाता।'' शिव जी के द्वारा अतिमहत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर संतुष्ट हुई पार्वती ने आशा व्यक्त की कि अवश्य ही मनुष्य को सद्बुद्धि प्राप्त होगी।
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शुक्रवार, 8 अगस्त 2008
ग्लोबल वार्मिंग से त्रस्त कैलाशपति
रविवार, 18 मई 2008
ग्लोबल वार्मिंग से कुल्लू के सेब पर प्रतिकूल असर
विकास शर्मा / चंडीगढ़
ग्लोबल वार्मिंग के कारण कुल्लू इलाके में सेब व्यवसाय इन दिनों घाटे का सौदा साबित हो रहा है। कभी मुनाफे के लिए मशहूर इस सौदे के बगान मालिकों को नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी के कारण होने वाले ग्लोबल वार्मिंग से इस इलाके में अब सेब का उत्पादन ऊपर के क्षेत्रों में हो रहा है। पहले सेब का उत्पादन मंडी, भूनतर, कुल्लू जैसे इलाकों में होता था। लेकिन अब यह उत्पादन मनाली में हो रहा है।
रॉयल डेलिसियस, रेड डेलिसियस व गोल्डन डेलिसियस नामक सेब को उगाने वाले कुल्लू के किसान इन दिनों कोई और फसल उगाने को विवश है।
कुल्लू में सेब बगान के मालिक अनिल ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण उनकी बीस बीघा की फसल सूख गई और वे अब किसी और फसल की ओर रुख करने को मजबूर है। अनिल इस मामले में अकेले नहीं है।
इस बदहाली का सामना और भी कई बगान मालिक कर रहे हैं। कभी उम्दा किस्म के सेब उत्पादन के लिए विख्यात कुल्लू इन दिनों अन्य उत्पादन का विकल्प तलाश रहा है। क्योंकि सेब का उत्पादन अब ऊंचाई वाले इलाकों में स्थानांतरित हो गया है।
हिमाचल प्रदेश का बागवानी विभाग भी उनकी बातों से सहमत है। वहां के कर्मचारियों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कुल्लू इलाके में सेब के उत्पादन में 15 से 20 फीसदी की गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि सेब की फसलों को एक सीजन में 1200 घंटे की ठंड की जरूरत होती है।
लेकिन बढ़ते तापमान से यहां की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बीते दस सालों से इस इलाके में प्रतिवर्ष एक डिग्री तापमान बढ़ रहा है। गर्मी में जहां पहले अधिकतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस होता था वही यह बढ़कर 35 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया है।
एक अन्य बगान मालिक नकुल खुल्लर ने बताया कि बीते पांच सालों में सेब उत्पादन के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है।
पहले सेब की खेती 4000 फीट की ऊंचाई पर होती थी लेकिन अब यह 5000 फीट की ऊंचाई पर की जा रही है।
कुल्लू बागवानी विभाग के उपनिदेशक बीएल शर्मा ने इस बारे में बताया कि यह सही है किकुल्लू के कुछ इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ा है लेकिन यहां के किसानों ने सेब की तुलना में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों की ओर भी अपना रुख कर लिया है।
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गर्म ग्रह का अभिशाप
चंद्रभूषण
देश में खाद्यान्नों की पैदावार इस साल औसत से ज्यादा होने की पुष्टि की जा चुकी है, फिर भी गेहूं, चावल, दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की कीमतें काबू में नहीं आ रही हैं। अन्य बातों के अलावा इसकी एक बड़ी वजह पूरी दुनिया पर मंडरा रहा खाद्यान्न संकट है। दक्षिण अमेरिकी देश हैती और अफ्रीकी देश सेनेगल के बाजारों में खाने के लिए भड़के दंगों में कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। कई और छोटे देशों में भयंकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। विश्व बैंक ने एक आधिकारिक बयान जारी करके कहा है कि खाद्यान्न संकट के चलते लगभग 50 देशों में इस साल दंगे-फसाद की स्थिति पैदा हो सकती है।
अपनी जरूरत से ज्यादा चावल उपजाने वाले फिलीपीन्स, म्यांमार और विएतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने संभावित खाद्य संकट को ध्यान में रखते हुए चावल निर्यात करने से मना कर दिया है। चावल के निर्यातकों में गिने जाने वाले भारत ने निर्यात पर औपचारिक रोक भले न लगाई हो लेकिन निर्यात शुल्क बढ़ाकर और 50 रूपये किलो से कम कीमत वाले चावल के निर्यात को प्रतिबंधित करके इसे बहुत मामूली स्तर पर ला दिया है। उधर गेहूं के अंतरराष्ट्रीय व्यापार की हालत भी अच्छी नहीं है। यूरोपीय देशों में गेहूं की उपज गिर जाने के कारण वहां से इसका निर्यात पिछले कई वषा से अत्यंत निचले स्तर पर चल रहा है।
सचमुच आश्चर्यजनक है कि जिस ग्लोबल वार्मिंग को हम अभी तक बौद्धिक हलकों में बहसियाई जाने वाली एक अकादमिक समस्या मानते आए हैं, वह अचानक लाखों लोगों का जीना-मरना निर्धारित करने लगी है। अपने यहां उपजने वाले चावल का 98 प्रतिशत हिस्सा निर्यात करके कई देशों का पेट भरने वाले ऑस्ट्रेलिया के मरे-डालग बेसिन में पिछले दस वर्षों से पड़ा सूखा अंतरराष्ट्रीय चावल संकट का सबसे बड़ा कारण है। दरअसल, धान काफी ज्यादा पानी की मांग करने वाला धान एक उष्णकटिबंधीय फसल है, और दुनिया के बहुत कम देश ही अपना चावल बड़ी मात्रा में बेच पाने में सक्षम माने जाते हैं। सरप्लस चावल उपजाने वालों में ऑस्ट्रेलिया की जगह अव्वल मानी जाती रही है, लेकिन उसके धनहर खेतों में तो पिछले कई वर्षों से धूल उड़ रही है।
सन् 2003 में यूरोप में 48 डिग्री सेल्सियस तक चले गए तापमान और अगस्त के महीने में लगातार एक हफ्ते चली जबर्दस्त लू में 35 हजार लोगों की जान जाने की खबर हम सभी को होगी, लेकिन इस असाधारण स्थिति को एक तरफ रख दें तो भी 1990 के दशक से वहां लगातार बढ़े तापमान ने यूरोपीय खेती का क्या हाल किया है, इस तथ्य से शायद ज्यादा लोगों की वाकफियत नहीं है। गेहूं और अंगूर यूरोप के ज्यादातर इलाकों की बुनियादी फसलें मानी जाती हैं और इन दोनों का उत्पादन वहां तेजी से गिरा है।अमेरिका के पूर्व उप-राष्ट्रपति और पिछले साल के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अल गोर की बनाई फिल्म ‘डे आफ्टर टुमारो’ में अंटार्कटिका के लार्सन बी आइस शेल्फ के पिघल जाने से गल्फ स्ट्रीम धारा का बहना बंद हो जाते दिखाया गया है। इसके चलते इधर इंग्लैंड के तटीय शहरों में तबाही आ जाती है तो उधर न्यूयॉर्क स्थायी रूप से बर्फ में जमकर रह जाता है। फिल्म के माध्यम के मुताबिक चुनी गई ये कुछ आश्चर्यजनक आशंकाएं हैं, जिन्हें फिल्म में सच होते दिखाया गया है। ये इतनी आश्चर्यजनक हैं कि इनके कभी सचमुच सही साबित हो जाने पर एकबारगी यकीन नहीं होता। लेकिन जैसी कहावत है, हकीकत हमेशा कल्पना से ज्यादा आश्चर्यजनक होती है।
दक्षिणी-पूर्वी आस्ट्रेलिया में लंबा सुखाड़ हो जाने से दसियों हजार किलोमीटर दूर हैती और सेनेगल में दंगे भड़क उठना, या यहां भारत में ही अपनी कार्यकुशलता का ढोल पीट रही केंद्र सरकार का अचानक संकटग्रस्त दिखने लगना हकीकत का सिर्फ एक पहलू है। बहुत सारी अन्य छोटी-छोटी चीजें भी हैं, जिनका महत्व पहली बार महसूस किया जा रहा है। ब्रिटिश जीवविज्ञानी रोनाल्ड रॉस ने सौ साल पहले भारत में मलेरिया पर अपना ऐतिहासिक काम इसे एक पराई बीमारी मानकर किया था। यूरोप में मच्छरों के होने की कल्पना ही नहीं की जाती थी, लिहाजा मलेरिया से वहां के डॉक्टरों या जीवविज्ञानियों का सीधे कोई साबका पड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। लेकिन आज गर्म होते यूरोप और उत्तारी अमेरिका में न सिर्फ मच्छर और पिस्सू हैं बल्कि मलेरिया, हैजा, प्लेग और कई अन्य उष्ण-कटिबंधीय बीमारियों के मरीज वहां दर्ज किए जाने लगे हैं।
जितनी हिकारत अमेरिकी हुक्मरानों ने ग्लोबल वामग से मुकाबले के लिए तय किए गए क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति बरती थी, वैसी पिछले साल पेरिस में हुए आईपीसीसी सम्मेलन के प्रति उनसे नहीं बरती गई। बल्कि आईपीसीसी के निष्कर्ष पर अपनी मोहर लगाते हुए ग्लोबल वामग के खिलाफ कमर कसकर उतर पड़ने का जुबानी जमाखर्च भी उन्होंने किया तो इसकी अकेली वजह यही थी कि सन् 2005 में वहां आए असाधारण चक्रवातीय तूफानों ने न सिर्फ एक समूचे शहर न्यू ऑलिएंस को नेस्तनाबूद कर दिया था बल्कि ग्लोबल वामग की प्रस्थापना को अमेरिका विरोधी साजिश बताते आए रिपब्लिक नेतृत्व की कमर तोड़कर रख दी थी।बीच-बीच में तेल कंपनियों और वाहन निर्माताओं के पे-रोल पर काम करने वाले वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् आज भी ऐसे सुर्रे छोड़ते रहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। ऐसा ही सुर्रा इन दिनों यह छूटा हुआ है कि अगले दस वषा में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि उत्तरी ध्रुव की एक पर्यावरणिक परिघटना अगले कुछ समय तक धरती के बढ़ते तापमान की लगाम थामे रहेगी। कुछ-कुछ ऐसी ही प्रस्थापनाएं टाइटनिक जहाज के डूबने से ऐन पहले तक उसके इंजीनियर और मैनेजर वगैरह भी देते रहे होंगे।
एक तरफ तेल, गैस और कोयले के दिनोंदिन रीतते भंडार इन सारी चीजों की कीमतें आसमान पर चढ़ाए जा रहे हैं, दूसरी आ॓र धरती का दम घोंट रहा इनका धुआं हजार तरीकों से इस ग्रह की जान लेने पर आमादा है। फिर भी विद्वज्जन न जाने किस अदालत से ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ दस वर्षों का ‘स्टे-ऑर्डर’ लेते आए हैं। समय आ गया है कि ऐसे खयाली उपायों के जरिए वास्तविक समस्याओं से निपट लेने का मोह हम छोड़ दें।
पहली बार हमारी संसद में अगले बीस-बाइस वर्षों में गंगा नदी के सूख जाने की आशंका को लेकर चर्चा हुई है। यह मामला सिर्फ चर्चा तक ही सिमटकर न रह जाए, इसके लिए हमें बहस इस बात पर करनी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ सार्थक करने के लिए हम क्या-क्या कदम उठाने के लिए, ठोस तौर पर कहें तो किस हद तक माली नुकसान बर्दाश्त करने के लिए तैयार हैं।
ग्लोबल वार्मिंग : कुछ तथ्य मिथ नहीं वास्तविकता
दिनेश रावत
* अब तक कई लोग समझते थे कि ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती का गरमाना एक मिथ है, हकीकत नहीं। लेकिन अब दुनियाभर के वैज्ञानिक अच्छी तरह सुनिश्चित कर चुके हैं कि हां, यह एक सच्चाई है और पृथ्वी पिछले कई सालों से विश्वव्यापी जलवायु परिवर्तन के अनेक संकेत दे रही है। पिछले साल 130 देशों के 2,500 वैज्ञानिक गहन शोध और अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मौजूदा ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य अथवा पूर्ण वजह मानवीय गतिविधियां हैं। मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग को अक्सर ‘एंथ्रोपोजेनिक क्लाइमेट चेंज’ भी कहा जाता है।
मंगलवार, 29 अप्रैल 2008
हिमयुग की आहट है ग्लोबल वार्मिंग
क्या आपने कभी सोचा है कि यदि पृथ्वी का अंत हुआ तो किस तरह होगा? एक झटके में या फिर आहिस्ता-आहिस्ता? यदि कोई बड़ा एस्ट्रायड या धूमकेतु पृथ्वी से टकराता है तो एक झटके में ही पृथ्वी से जीवन का समूल नाश हो जाएगा और यदि तुरंत रोकथाम के उपाय नहीं किए गए तथा ग्लोबल वार्मिंग इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो पृथ्वी से मानव समेत जीवों की सभी प्रजातियां आहिस्ता-आहिस्ता विलुप्त हो जाएगी। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे ने मुख्यतः 1990 के अंतिम महीनों के बाद से दुनियाभर का ध्यान आकर्षित किया है। आइए जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग है क्या?
पृथ्वी पर जीवन को विकसित करने और इसे फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने का काम वायुमंडल करता है। हमारे वायुमंडल में मुख्यतः आक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड जैसी अन्य ‘ग्रीन हाउस’ गैसें विद्यमान हें जो धरती से परावर्तित सूर्य की किरणों के कुछ अंश सोखकर पृथ्वी को गर्म रखती है और अतिरिक्त गर्मी को अंतरिक्ष में विलीन हो जाने देती है। वर्तमान में ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ जाने के कारण यह प्राकृतिक चक्र गड़बड़ा गया है। ग्रीन हाउस गैसें यदि अत्यधिक बढ़ जाएंगी तो न केवल पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश ही पहुंचना कम होता जाएगा, बल्कि पृथ्वी से परावर्तित सूर्य की किरणें और अतिरिक्त गर्मी भी वायुमंडल से बाहर नहीं जा सकेगी। इस स्थिति में पहले तो पृथ्वी का तापमान बढ़ता चला जाएगा और उसके बाद सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में न मिलने के कारण पृथ्वी तेजी के साथ ठंडी होने लगेगी और हिमयुग आ जाएगा। यह एक ऐसी स्थिति होगी जिसमें मानव, पेड़-पौधों व जानवरों समेत जीवन का प्रत्येक स्वरूप विलुप्त हो जाएगा। पृथ्वी का जैविक इतिहास बताता है कि बीते 50 करोड़ वर्षों में छह ऐसी घटनाएं घट चुकी है जब पृथ्वी से ज्यादातर जीव प्रजातियां लुप्त हो गई। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हम अब सातवीं बार पृथ्वी से जीवन विलुप्त होने के डर के साए में जी रहे है।
फिल्म ‘द डे आफ्टर टुमारो’ में निर्देशक रोनाल्ड एमेरिक ने ग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक स्वरूप से लेकर हिमयुग के आगमन तक की स्थिति दर्शाई है। दूसरी ओर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को लेकर शीर्ष मौसम व भू विज्ञानियों और राजनीतिज्ञों के बीच एक अलग बहस चल रही है और इस बहस का कारण है पेटागन की एक रिपोर्ट। यह रिपोर्ट अमेरिका के समक्ष उत्पन्न होने वाले दीर्घकालीन खतरों को भांपने व उनका आंकलन करने का काम करने वाले पेंटागन के एक वरिष्ठ सदस्य एंड्रयू. डब्लू. मार्शल के दो सलाहकारों द्वारा ‘एन एबरप्ट क्लाईमेंट चेंज सिनारियो एंड इट्स इम्प्लीकेशंस फार यूनाईटेड स्टेट्स नेशनल सिक्योरिटी’ शीर्षक से लिखी गई है। मार्शल का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से संबंधित यह रिपोर्ट उन्होंने पिछले वर्ष देश के शीर्ष वैज्ञानिक सलाहकार केंद्र नेशनल एकेडमीज आफ साइंस के इसी विषय पर एक अध्ययन को पढ़ने के बाद तैयार करवाई है। नेशनल एकेडमीज आफ साइंस ने अपने अध्ययन में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति स्पष्ट चेतावनी देते हुए इसे मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर खतरे के रूप में चिन्हित किया है। पेंटागन की यह अतिगोपनीय रिपोर्ट मीडिया में कैसे लीक हो गई? यह एक अलग रहस्य है, बहरहाल ब्रिटेन का एक समाचारपत्र ‘द आब्जर्वर’ इस पर टिप्पणी करते हुए लिखता है, ‘पेंटागन ने इस रिपोर्ट द्वारा बुश से कहा है कि वातावरण में हो रहे बदलाव अंततः हमें नष्ट कर देंगे।’ पेंटागन की गोपनीय रिपोर्ट में ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों के तौर पर प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही शहरों में अराजकता और नाभिकीय युद्ध तक की स्थिति उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है। उधर कुछ पर्यावरणविदों और विज्ञानियों का मानना है कि पैंटागन की इस रिपोर्ट और रोनाल्ड एमेरिक की फिल्म से आम लोगों में ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए जागरूकता बढ़ेगी। वहीं कुछ विज्ञानियों का मानना है कि इस रिपोर्ट से और कुछ हो या न हो विकासशील देशों के विरुद्ध बुश प्रशासन के हाथ ग्लोबल वार्मिंग नाम का एक नया हथियार जरूर लग गया है। पेंटागन के श्री मार्शल के लिए एक लाख डालर की ग्रांट के बदले यह रिपोर्ट लिखने वाले उन दो सलाहकारों में से एक पीटर श्वार्टज का कहना है कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में जानबूझकर सबसे बदतर स्थितियों का जिक्र किया है। वह कहते हैं कि मेरा लक्ष्य सैन्य रणनीतिज्ञों को उस परिस्थिति के बारे में सोचने के लिए मजबूर करना था जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। रोनाल्ड एमरिक की फिल्म में तो इससे भी कहीं आगे की स्थिति दिखाई गई है। फिल्म डे आफ्टर टुमारो का मुख्य पात्र एक पेलियो क्लाईमेटोलाजिस्ट (भूतकाल में मौसम में हुए बदलावों का अध्ययन करने वाला विज्ञानी) प्रो. एड्रियन हाल है जिनकी मुख्य चिंता ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्पन्न होने वाली बदतर स्थितियों से इस दुनिया को और अपने बेटे सैम को बचाना है।
सोमवार, 28 अप्रैल 2008
वनाच्छादित धरा ही मानव के सुकून
औद्योगिक क्रांति के बाद पृथ्वी पर आए परिवर्तन के इस दौर में मानव के सुकून के लिए वनाच्छादित धरा ही एकमात्र आधार है, इसके लिए पौधों का रोपण और उनका संरक्षण ही एकमात्र विकल्प है। इस दिशा में न केवल वन विभाग अपितु जनसामान्य को भी प्रयास करने होंगे। यह विचार वन मण्डल डगरपुर के तत्वावधान में विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर मंगलवार को वन विभाग कार्यालय में आयोजित संगोष्ठी में विभिन्न वक्ताओं ने व्यक्त किए।