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गुरुवार, 28 अगस्त 2008

कई बीमारियों की एक दवा : नीम - पदमा श्रीवास्तव

नीम एक ऐसा पेड़ है जो सबसे ज्यादा कड़वा होता है परंतु अपने गुणों के कारण चिकित्सा जगत में इसका अपना एक अहम स्थान है।

नीम रक्त साफ करता है। दाद, खाज, सफेद दाग और ब्लडप्रेशर में नीम की पत्ती का रस लेना लाभदायक है। नीम कीड़ों को मारता है इसलिये इसकी पत्ती कपड़ों और अनाजों में रखे जाते हैं। नीम की दस पत्तियां रोजाना खायें रक्तदोष रहीं होगा। नीम के पंचांग जड़, छाल, टहनियां, फूल पत्ते और निंबोली उपयोगी हैं। इन्ही कारणों से हमारे पुराणों में नीम को अमृत के समान माना गया है। अमृत क्या है जो मरते को जिंदा करे। अंधे को आंख दे और निर्बल को बल दे। नीम इंसान को तो बल दोता ही है पेड़-पौधों को भी बल देता है जैसे- खेतों में नीम के पानी की दवा बनाकर डाला जाता है। अब तक तो आप समझ ही चुके होंगे कि नीम एक औषधि के रूप मे प्रयोग होता है।

नीम, आंख, कान, नाक, गला और चेहरे के लिए उपयोगी, आंखों में मोतियाबिंद और रतौंधी हो जाने पर नीम के तेल को सलाई से आंखों नें अंजल की तरह से लगायें।

आंखों में सूजन हो जाने पर नीम के पत्ते को पीस कर अगर दाई आंख में है तो बाएं पैर के अंगूठे पर नीम का पत्ती को पीस कर लेप करें। ऐसा अगर बाई आंख में हो तो दाएं अंगूठे पर लेप करें। आंखों की लाली व सूजन ठीक हो जायेगी।
अगर कान में दर्द हो या फोड़ाफुंसी हो गयी हो, तो नीम या निंबोली को पीस कर उसका रस कानों मे टपका दें। कान में कीड़ा गया हो, तो नीम की पत्तियों का रस गुनगुना करके इसमें चुटकी भर नमक डालकर टपकायें एक बार में ही कीड़ा मर जायेगा। अगर बहुत जरूरत हो तो दूसरे दिन डालें।
अगर कान में दर्द हो तो 20ग्राम नीम की पत्तियां, 2 तोला नीलाथोथ (तूतिया) डालकर पीस लें इसकी छोटी छोटी गोलियां बनाकर सुखा लें फिर काले तिल या साधारण तेल में पका लें जब टिकिया जल जाये, तो इस तेल को छान कर रख लें अब एक तीली मे रूई लगा कर इस तेल में डुबाकर कान साफ करें बार बार रूई बदलें। अगर कान से पीप आ रहा है तो नीम के तेल में शहद मिलाकर कान साफ करें पीप आना बंद हो जायेगा।
सर्दी जुकाम हो गया हो तो नीम की पत्तियां शहद मिलाकर चाटें। खराश ठीक हो जायेगी।
ह्रदय रोग में नीम रामबाण का काम करता है। अगर आपको ह्रदय रोग हो, तो नीम की पत्तियों की जगह नीम का तेल का सेवन करें। नीम पीस कर त्वचा पर लगायें ज्यादा फायदा होगा।

दांत और पेट के रोग का इलाज

दांत और पेट का एक-दूसरे से सीधा संबंध होता है । दांतों से चबाया भोजन हमारे पेट में जाता है अगर दांत भोजन को चबाकर इस लायक नहीं बना पाते कि वह पेट मे जाकर आसानी से हजम कर सके, तो पेट खराब हो जायेगा। पेट खराब तो होगा ही साथ पेट की कई बीमारियां भी पैदा होगीं। इस कारण वैद्य लोग रोगों का इलाज पेट ही से शुरू करते थे। इसके पीछे कारण यह है कि पेट ठीक तो सब ठीक। इसके लिये दांतों को नीम, बबूल की दातुन से साफ करें अगर संभव हो तो एक बार घर पर ही इसका मंजन को बना लें जिसमें जली सुपारी, जले बादाम के छिलके, 100ग्राम खडिया मिट्टी, 20ग्राम बहेडे, थोड़ी सी कालीमिर्च, 5ग्राम लौंग, एक आधा ग्राम पीपरमिंट इन सब को पीस कर छान लें। इसे मंजन की तरह इस्तमाल करें। दांत की सब बीमारियां, पायरिया, दुर्गंध दूर हो जायेगी। साथ ही नीम के पत्ते भी चबाते रहा करें।
अब पेट के बारे में देखें, अगर अपच हो जाये तो निंबोली खायें रूका हुआ मल बाहर निकालता है। रक्त स्वच्छ करेगा और भूख अधिक लगेगी। बासी खाना खाने से पित्त, उल्टियाँ हो, तो इसके लिये नीम की छाल, सोंठ, कालीमर्च को पीस लें और आठ-दस ग्राम सुबह-शाम पानी से फंकी लें। तीन चार दिनों में पेट साफ हो जायेगा। यदि दस्त हो रही हों, तो नीम का काढ़ा बनाकर लें।
गंदे पानी के मच्छर, मक्खी से होने वाले रोग तेजी से फैलते हैं। इसका उपाय भी नीम से है पांच लौंग, पांच बड़ी इलायची, महानीम(बकायन) की सींके पीसकर। पचास ग्राम पानी में मिलाकर थोड़ा गर्म कर लें ये एक बाऱ की मात्रा है। इसे दो-दो घंटे बाद बनाकर देते रहें है। साथ –साथ हाथ पैरों मे नीम के तेल की मालिश भी करें। कमजोरी दूर होगी। अगर किसी रोगी को पेशाब नहीं आ रही है तो नीम के पत्ते पीसकर पेट पर लगायें ठीक हो जायेगा।
यदि पेट में कीड़े हो, तो (बड़ा हो या बच्चा) नीम की नई कोपलें के रस में शहद मिलाकर चाटें कीड़े समाप्त हो जायेंगे। पानी में नीम के तेल की कुछ बूंदें डालकर चाय की तरह पी जायें बच्चे को 5बूंद बड़ों को 8 बूंद इससे ज्यादा नहीं लेना है। नीम के पत्ते जरा सी हींग के साथ पीस लें और चाट जायें पेट के कीड़े नष्ट हो जायेंगे।

त्वचा व बालों का इलाज

नीम का प्रयोग करें और निखारें अपना सौंदर्य। रक्त को शुद्ध करने के लिये नीम को एक वरदान ही समझिये। नीम की छाल का काढ़ा बनाकर पी लें। यदि नीम की नई कोपलें मिल जाये को 20-25 ले लें चार-पांच दाना काली मिर्च डाल कर बेसन की रोटी में मिलाकर बनायें घी में खूब तर कर लें। इस तरह कम से कम आठ दिन तक खायें। हाथ-पांव में अधिक पसीना आता हो, तो नीम रोगन का तेल अच्छी औषधि है।
चेहरे पर कील मुंहासे होने पर नीम का तेल लगायें। झाईयां और चेचक दाग छुड़ाने के लिये निंबोती का तेल लगायें।
फोड़ेफुसी हो, तो नीम की छाल घिसकर लेप करें।
अगर बालों में लीख जुएं हो, तो नीम का तेल लगायें ।
गंजापन हो गया हो तो नीम का तेल लगायें।
बाल पकने लगे तो नीम तथा बेर की पत्तियां पानी में उबालकर उस पानी से सर धोयें।
यदि बाल काले करना हो, तो नीम को पानी में उबाल कर सर धोयें। कम से कम एक महीना नतीजा आप के सामने होगा।
कुष्ट रोग के लिये नीम एक वरदान के समान है इस रोग का इलाज नीम से हो सकता है। कुष्ट रोग फूट जाये तो नीम के नीचे सोयें, नीम खाओ, नीम बिछाकर सोयें।
बुखार, पुराना बुखार, टाईफाइड हो, तो 20-25 नीम के पत्ती 20-25 काली मिर्च एक पोटली में बांधकर आधा किलो पानी में उबालें पानी खौलने दें ढक्कन लगाकर रखें, ठंडा होने पर चार हिस्सा बनाकर सुबह-शाम दो दिन तक पिलायें फिर देखे बुखार उतरा या नही। इस विधि से तो पुराना से पुराना बुखार भी उतर जाता है।

नीम


पौराणिक भाई जहां पर भारत की तीन नदियां (गंगा, यमुना और सरस्वती) मिलती हैं, उस स्थान को तीर्थराज, त्रिवेणी व प्रयागराज कहते हैं - वहां स्नान करने व उसकी तीर्थ यात्रा करने से सब पापों से छुटकारा मिल जाता है और परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है, यह बात तो सर्वथा मिथ्या है। किन्तु नीम, पीपल और वट (बड़) इन तीनों वृक्षों को एक साथ एक ही स्थान पर लगाने की बहुत ही पुरानी परिपाटी भारतवर्ष में प्रचलित है और इसे भी त्रिवेणी कहते हैं।
इन तीन वृक्षों की त्रिवेणी का औषध रूप में यदि यथोचित रूप में सेवन किया जाये तो बहुत से भयंकर शारीरिक रोगों से छुटकारा पाकर मानव सुख का उपभोग कर सकते हैं । ये तीनों ही वृक्ष अपने रूप में तीन औषधालय हैं । इसीलिये भारतवर्ष के लोग इसका न जाने बहुत प्राचीनकाल से नगरों में, ग्रामों में, सड़कों पर, तड़ाग व तालाबों पर सर्वत्र ही इनको आज तक लगाते आ रहे हैं । इसको धर्मकृत्य व पुण्यकार्य समझकर बहुत ही रुचि से इन वृक्षों को लगाते तथा जलसिंचन करते हैं तथा बाड़ लगाकर इनकी सुरक्षा का सुप्रबंध भी करते हैं।

निम्ब: (नीम)

नीम कड़वा व कड़वे रस वाला, शीत (ठंडा), हल्का, कफरोग, कफपित्त आदि रोगों का नाशक है । इसका लेप और आहार शीतलता देने वाले हैं । कच्चे फोड़ों को पकाने वाला और सूजे तथा पके हुए फोड़ों का शोधन करने वाला है । राजनिघन्टु में इसके गुण निम्न प्रकार से दिये गए हैं : नीम शीतल, कडुवा, कफ के रोगों को तथा फोड़ों, कृमि, कीड़ों, वमन तथा शोथ रोग को शान्त करने वाला है। बहुत विष और पित्त दोष के बढे हुए प्रकोप व रोगों को जीतने वाला है और हृदय की दाह को विशेष रूप से शान्त करने वाला है। बलास तथा चक्षु संबंधी रोगों को जीतने वाला है।


बलास फेफड़ों और गले के सूजन के रोगों का नाम है। इसको भी निम्ब दूर करता है । बलास में क्षय यक्ष्मा तथा श्वासरोग के समान कष्ट होता है।

नीम के पत्ते नेत्रों को हितकारी, वातकारक, पाक में चरपरे, सर्व की अरुचि, कोढ, कृमि, पित्त तथा विषनाशक हैं। नीम की कोमल कोंपलें व कोमल पत्ते संकोचक, वातकारक तथा रक्तपित्त, नेत्ररोग और कुष्ठ को नष्ट करने वाले हैं।

नीम के फल कड़वे, पाक में चरपरे, मलभेदक, स्निग्ध, हल्के, गर्म और कोढ, गुल्म बवासीर, कृमि तथा प्रमेह को नष्ट करने वाले हैं। नीम के पके फलों के ये गुण हैं: पकने पर मीठी निम्बोली (फल) रस में कड़वी, पचने में चरपरी, स्निग्ध, हल्की गर्म तथा कोढ, गुल्म, बवासीर, कृमि और प्रमेह को दूर करने वाली है।

नीम के फूल पित्तनाशक और कड़वे, कृमि तथा कफरोग को दूर करने वाले हैं।

नीम के डंठल कास (खांसी), श्वास, बवासीर, गुल्म, प्रमेह-कृमि रोगों को दूर करते हैं।

निम्बोली की गिरी कुष्ठ और कृमियों को नष्ट करने वाली हैं। नीम की निम्बोलियों का तेल कड़वा, चर्मरोग, कुष्ठ और कृमिरोगों को नष्ट करता है।

निम्बादिचूर्ण : नीम के पत्ते 10 तोले, हरड़ का छिलका 1 तोला, आमले का छिलका 1 तोला, बहेड़े का छिलका 1 तोला, सोंठ 1 तोला, काली मिर्च 1 भाग, पीपल 1 तोला, अजवायन 1 तोला, सैंधा लवण 1 तोला, विरिया संचर लवण 1 तोला, काला लवण 1 तोला, यवक्षार 2 तोले - इन सब को कूट छान कर रख लें। इसको प्रात:काल खाना चाहिये। मात्रा 3 माशे से 6 माशे तक है। यह विषम ज्वरों को दूर करने के लिए सुदर्शन चूर्ण के समान ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है। इसके सेवन से प्रतिदिन आने वाला, सात दिन, दस दिन और बारह दिन तक एक समान बना रहने वाला धातुगत ज्वर और तीनों रोगों से उत्पन्न हुआ ज्वर - इन सभी ज्वरों में इसके निरंतर सेवन से अवश्य लाभ होता है।

नीम का मलहम : नीम का तैल 1 पाव, मोम आधा पाव, नीम की हरी पत्तियों का रस 1 सेर, नीम की जड़ की छाल का चूर्ण 1 छटांक, नीम की पत्तियों की राख आधा छटांक। एक लोहे की कढाई में नीम का तैल, नीम की पत्तियों का रस डालकर हल्की आंच पर पकायें। जब जलते-जलते छटांक, आधी छटांक रह जाये तब उसमें मोम डाल दें। जब मोम गलकर तैल में मिल जाये तब कढाई को चूल्हे से नीचे उतार लेवें। फिर नीम की छाल का चूर्ण और नीम की पत्तियों की राख उसमें मिला देवें। यह नीम का मलहम बवासीर के मस्सों, पुराने घाव, नासूर जहरीले घावों पर लगाने से बहुत लाभ करता है। यह घावों का शोधन और रोपण दोनों काम एक साथ करता है। सड़े हुए घाव, दाद, खुजली, एक्झिमा को भी दूर करता है। पशुओं के घावों को भी ठीक करता है ।

महानिम्ब (बकायण)

महानिम्ब बकायण के विषय में धनवन्तरीय निघण्टु में इस प्रकार लिखा है :

महानिम्ब: स्मृतोद्रेको विषमुष्टिका।
केशमुष्टिर्निम्बर्को रम्यक: क्षीर एव च॥

बकायण को संस्कृत में महानिम्ब:, उद्रेक:, विषमुष्टिक:, केश-मुष्टि, निम्बरक, रम्यक और क्षीर नाम वाला कहा गया है।बकायण के वृक्षों में फाल्गुन और चैत्र के मास में एक दूधिया रस निकलता है। यह रस मादक और विषैला होता है। इसीलिये फाल्गुन और चैत्र के मास में इस वनस्पति का प्रयोग नहीं करना चाहिये।

बकायण का वृक्ष सारे ही भारत में पाया जाता है। इसके वृक्ष 32 से 40 फुट तक ऊंचे होते हैं। इसका वृक्ष बहुत सीधा होता है। इसके पत्ते नीम के पत्तों से कुछ बड़े होते हैं इसके फल गुच्छों के अंदर लगते हैं। वे नीम के फलों से बड़े तथा गोल होते हैं। फल पकने पर पीले रंग के होते हैं। इसके बीजों में से एक स्थिर तैल निकलता है जो नीम के तैल के समान ही होता है। इसका पंचांग अधिक मात्रा में विषैला होता है।

इसके नाम अन्य भाषाओं में निम्न प्रकार से हैं : संस्कृत में महानिम्ब, केशमुष्टि, क्षीर, महाद्राक्षादि। हिन्दी में बकायण निम्ब, महानिम्ब, द्रेकादि। गुजराती - बकाण, लींबड़ो। बंगाली में घोड़ा नीम। फारसी- अजेदेदेरचता, बकेन।पंजाबी बकेन चेन, तमिल : मलः अबेबू सिगारी निम्ब, उर्दू - बकायन। लेटिन melia a zedaracha ।

मुस्लिम देशों में इस वनस्पति का उपयोग बहुत बड़ी मात्रा में किया जाता है। फारस के हकीम इसकी जानकारी भारत से ले गए थे। उन लोगों के मत से इस वृक्ष की छाल, फूल, फल और पत्ते गर्म, और रूक्ष होते हैं। इसके पत्तों कारस अन्त:प्रयोगों में लेप से मूत्रल, ऋतुस्राव नियामक और सर्दी के शोथ को मिटाने वाला होता है। अमेरिका में इसके पत्तों का काढा हिस्टेरिया रोग को दूर करने वाला, संकोचक और अग्निवर्धक माना जाता है। इसके पत्ते और छाल गलितकुष्ठ और कण्ठमाला को दूर करने के लिए खाने और लगाने के कार्य में प्रयुक्त किए जाते हैं। ऐसा विश्वास वहां पर है कि इसके फलों से पुलिटश के कृमियों का नाश हो जाता है इसीलिये चर्मरोगों के नाशार्थ यह उत्तम औषधि मानी जाती है।
इंडोचाइना में इसके फूल और फल अग्निवर्धक, संकोचक और कृमिनाशक माने जाते हैं। कुछ विशेष प्रकार के ज्वर और मूत्र संबन्धी रोगों में इसके फलों का प्रयोग होता है ।

मीठा नीम

इसे कढी-पत्ता का पेड़ भी कहा जाता है। मीठे नीम के कैडर्य, महानिम्ब:, रामण:, रमण:, महारिष्ट, शुक्लसार, शुक्लशाल:, कफाह्वय:, प्रियसार और वरतिक्तादि संस्कृत में नाम हैं। हिन्दी में मीठा नीम। मराठी कलयनिम्ब, पंजाबी गंधनिम्ब, तमिल करुणपिल्ले, तेलगू करिवेपमू, फारसी सजंद करखी कुनाह, लेटिन murraya koenigie नाम भिन्न-भिन्न भाषाओं में मीठे नीम के हैं।

मीठे नीम के पेड़ प्राय: भारतवर्ष के सभी भागों में पाये जाते हैं। इसके पेड़ की ऊंचाई 12 से 15 फुट तक की होती है। इसके पत्ते देखने में नीम के पत्तों के समान ही होते हैं किन्तु ये कटे किनारों के नहीं होते। चैत्र और वैशाख में इसके पेड़ पर सफेद रंग के फूल आते हैं। इसके फल झूमदार होते हैं। पकने पर इस के पत्तों का रंग लाल हो जाता है । इसके पत्तों में से भी एक प्रकार का सुगंधित तैल निकलता है। यूनानी मत में यह पाचक, क्षुधा कारक, धातु उत्पन्न करने वाला, कृमिनाशक, कफ को छांटने वाला और मुख की दुर्गन्ध को मिटाने वाला होता है । यह दूसरे दर्जे में गर्म और खुश्क होता है । इसकी जड़ को घिसकर विषैले कीड़ों के काटने के स्थान पर लगाने से लाभ होता है।

भोजन के रूप में : इसके सूखे पत्ते कढी में छोंक लगाने तथा दाल को स्वादिष्ट बनाने के कार्य में आते हैं। इनको चने के बेसन में मिलाकर पकौड़ी भी बनाई जाती है। मूत्राशय के रोगों में इसकी जड़ों का रस सेवन लखीमपुर आसाम में अच्छा उपयोगी माना जाता है।इंडोचाइना में इसका फल संकोचक माना जाता है और इसके पत्ते रक्तातिसार और आमातिसार को दूर करने के लिए अच्छे माने जाते हैं।

सारांश यह है कि मीठे नीम के वही गुण हैं जो प्राय: करके कड़वे नीम में हैं तथा जो धनवन्तरीय निघन्टु में लिखे हैं वही प्रयोग करने पर यथार्थ रूप में पाये गए हैं।

कड़वे निम्ब, मीठे निम्ब तथा बकायण के गुण मिलते हैं । इस प्रकार नीम व नीमवृक्ष में इतने गुण हैं कि उसकी प्रशंसा जितनी की जाये उतनी थोड़ी है। सचमुच त्रिवेणी में स्नान करना तो मूर्खता है किन्तु नीम, पीपल और बड़ की त्रिवेणी का सेवन सब दुखों को दूर करके प्राणिमात्र के कष्ट दूर करके सुखी बनाता है।

साभार www.jatland.com

सोमवार, 25 अगस्त 2008

नीम : भौतिक एवं रासायनिक संरचना

यद्यपि नीम वृक्ष को `चिरहरित' कहा गया है, किन्तु वसंत ऋतु में इसके पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और नये ताम्रवर्णी कोमल टूसे निकलते हैं। मिट्टी एवं जलवायु की स्थिति के अनुरूप भारत में जनवरी से मई तक (दक्षिण में थोड़ा पहले और उत्तर में थोड़ा विलम्ब से) इसमें फूल आता है और मई से सितम्बर तक इसमें फल लगने से पकने तक की प्रक्रिया चलती है। अमेरिका के दक्षिणी इक्वाडोर के हिस्सों में इस नीम पर नवम्बर-दिसम्बर में भी फूल निकल आते हैं। पश्चिमी अफ्रीका के सेनेगल, बेनिन एवं जाम्बिया के नीम वृक्ष वर्ष में दो बार फलते हैं-मार्च अप्रैल एवं जुलाई-अगस्त में, कहीं-कहीं अक्टूबर-नवम्बर में भी। डामिनियन रिपब्लिक के अजुआ घाटी में यह वर्ष में तीन बार तक फल देते देखा गया-फरवरी-मार्च, जून-अगस्त तथा नवम्बर-दिसम्बर में। अर्थात वहाँ यह सालों भर फूलता-फलता है। अनुकूल परिवेश में यह वृक्ष बहुत तेजी से ४-५ साल में ही बड़ा हो जाता है और सामान्यत: १५ से २५ मीटर तक की ऊँचाई और लगभग १५० वर्ष की आयु प्राप्त करता है। कहीं-कहीं इसे ३५-४० मीटर तक भी ऊँचा और २०० वर्ष से भी अधिक उम्र प्राप्त करते देखा गया है। भारत में मई से अगस्त तक नीम में फल आता है और पकता है।

पुराने नीम पेड़ से एक दुर्लभ रस झड़ता है, जिसे `नीमताड़ी' (Nimtody अथवा Toddy of Margosa tree) कहा जाता है। किन्तु यह सभी वृक्षों से नहीं झड़ता। कुछ पुराने वृक्ष जब उत्तेजना में आते हैं; तब उसके तने या डाल के गांठों से यह स्वत: फूट कर चूने लगता है और २ से ४ सप्ताह तक, किसी-किसी वृक्ष से साल भर तक निकलता है। जब यह रस चूना शुरू होता है, तब वृक्ष से एक मधुर ध्वनि निकलती है। यह रस स्वाद में मधुर कड़वा, अप्रिय तथा स्वच्छ गाढ़ा होता है। इसमें एक शर्करीय खमीर होता है, जो तापहर, पुष्टीकारक एवं स्वास्थ्यवर्धक होता है। यह रस पूरे वृक्ष की वास्तविक ताकत होती है। इसके निकल जाने के बाद वृक्ष क्रमश: सूखने लगता है। यह रस कई रोगों में निदान के लिए रामवाण के समान है। नीमताड़ी को कृत्रिम रूप से भी निकाला जाता है। जलाशय, नदी-नाले के पास खड़े पुराने वृक्ष का सोर सिरे पर काटने से रस चूने लगता है। किन्तु २४ घंटे में यह एक-दो बोतल ही निकल पाता है। स्वत: निकले रस की अपक्षा यह कम प्रभावकारी होता है।
नीम का सम्पूर्ण भाग कड़वा होता है, किन्तु कोई भी भाग अनुपयोगी नहीं होता। इसकी जड़, छाल, पत्ते, फूल, फल, गोंद, मद, सींक, टहनी एवं लकड़ी और इसकी छाया तथा इससे छनकर आने वाली हवा, सभी में कृषि, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए अमृत भरे हैं। विभिन्न घरेलू उपयोग तथा आर्थिक एवं व्यावसायिक दृष्टि से इनकी उपयोगिता अत्यन्त मूल्यवान है। सम्पूर्ण वनस्पति जगत में फिलहाल एक नीम को छोड़कर दूसरा ऐसा कोई वृक्ष नहीं, जिसका रत्तीभर अंश भी अनुपयोगी न हो। आज मानव सभ्यता संकटों के जिस भयावह दौर से गुजर रही है, उससे बचाने में नीम के समान प्रभावकारी कोई अन्य वृक्ष नहीं। औषधि के लिए सदियों से भारतीय ग्रामीणजन की इस वृक्ष पर व्यापक निर्भरता के कारण इसे `भारतीय ग्रामीण औषधालय' (Village Pharmacy of India) कहा जाता है। यह भारत के अतिरिक्त बंगलादेश, श्रीलंका, म्यांमार तथा पश्चिमी अफ्रीकी देशों का प्राय: एक घरेलू वृक्ष है, जहाँ आबादी के बीच, घरों के आस-पास, सड़कों के किनारे तथा पार्क आदि में लगाया जाता है।
भारतीय नीम, जिसे दुनियाँ के वैज्ञानिकों ने उत्तम कोटि का माना है, अपने हर अंग-प्रत्यंग से शुद्धता, ताजगी और निरोगता का परिचय देता है। इसके गुच्छेदार फूल से चमेली की भीनी सुगंध आती है। इसमें द्राक्षा (Glucocide), निम्बोस्ट्रीन तथा तीक्ष्ण गंध वाले तेल और वसा अम्ल पाये जाते हैं। इसका अर्क उत्तेजक, पुष्टीकारक तथा क्षुधावर्धक होता है। नीम की पत्तियों में १२.४० से १८.२७ प्रतिशत तक क्रूड प्रोटीन, ११.४० से २३.०८ प्रतिशत तक क्रूड फाइबर, ४८ से ५१ प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेट्स, ४३.३२ से ६६.६० प्रतिशत तक नाइट्रोजन मुक्त अर्क, २.२७ से ६.२४ प्रतिशत तक अन्य अर्क, ७.७३ प्रतिशत से १८.३७ प्रतिशत तक राख, ०.८९ से ३.९६ प्रतिशत तक कैल्सियम, ०.१० से ०.३० प्रतिशत तक फास्फोरस और २.३ से ६.९ प्रतिशत तक वसा पाया जाता है। इसमें लोहा तथा विटामिन `ए' की मात्रा भी पर्याप्त होती है। नीम छाल में फास्फोरस, शर्करा, कांसी तथा गंधक काफी मात्रा में पाया जाता है। नीम फल का गुदा मीठा, हल्का खुमारी लिए होता है। इसके बीज के तेल में स्टिआरिक एसिड, ओलेक एसिड तथा लारिक एसिड पाये जाते हैं। इस तेल का अंग्रेजी नाम `मार्गोसा' है। पूरे वृक्ष का यह भाग (बीज) आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण एवं उपयोगी भाग है।
विश्व के उन तमाम देशों में, जहाँ नीम के वृक्ष पाये जाते हैं, नीम वृक्ष पर भिन्न प्रकार के कीटों, फफुंदों तथा बैक्टेरिया रोग के आक्रमण होते देखे गये हैं। सामान्यत: यह माना जाता है कि नीम का सम्पूर्ण भाग कड़वा एवं तिक्त होने के कारण उसमें कोई कीटाणु या रोग नहीं लगते, परन्तु यह लक्षण उन्हीं जगहों पर पाये जाते हैं, जहाँ का जलवायु तथा भौगोलिक परिवेश नीम के एकदम अनुकूल है। इसमें जहाँ भी असंतुलन है, वहीं उसमें कीड़े तथा रोगाणु भी हमला करते देखे गये हैं। भारत में प्राय: दक्षिण के समुद्री किनारों के क्षेत्रों तथा गुजरात में नीम वृक्ष की पत्तियों, टहनियों तथा तनों में स्पाइडर, गाल माइट्स, टी मस्किटो बग इत्यादि कीड़े लगते देखे गये हैं। टी मस्किटो बग नीम के लिए काफी हानिकारक है, वह टहनियों पर हमला करता है, पूरी टहनी एवं पत्ते सूख जाते हैं। नीमगोल्ड नामक कीटनाशक से इसे नियंत्रित किया जाता है। कुछ परजीवी पौधे (Parasitic Plant) भी नीम को प्रभावित कर उसकी तिक्तता कम कर देते हैं।
नीम वृक्ष अनुकूल वातावरण में तेजी से विकास करता है। मिट्टी, वर्षा, सिंचाई, पोषक तत्त्व, तापमान, जैवकीय गुण आदि के PH Value तथा Water Table इसमें मुख्य भूमिका निभाते हैं। विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न जलवायु तथा मिट्टी की संरचना के अनुसार वहाँ नीम वृक्ष में फल, फूल लगने के समय तथा उसकी मात्रा, वजन और उसमें पाये जाने वाले यौगिकों के गुणों में भी काफी अन्तर देखा गया है। अनुसंधान में यह भी पाया गया है कि भारत के शुष्क क्षेत्र (उत्तरी भारत) के नीम बीजों में समुद्री किनारे वाले क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक कीट भक्षण प्रतिरोधी गुण (antifeedant activities) मौजूद हैं।

नीम के विविध उपयोग

१. लकड़ी रूप में
१५ -२० वर्षों के एक सुडौल नीम वृक्ष के तने की लम्बाई करीब ३ मीटर और घेरा डेढ़ मीटर तक होती है। इसे चीरने पर ऊपरी भाग भूरे रंग का सफेद और भीतरी भाग लाल भूरा दिखता है। इसके रेशे गठे हुए ,मजबूत और टिकाऊ के साथ सुगंधित होते हैं। इसमें कीड़े और फंुगी नही लगते। नीम की लकड़ी में सागौन के गुण व क्षमता होती है। दरवाजे के बाहर लगाने पर भी यह टिकाऊ होती है। हाथ या मशीन से भी इसे चीरना आसान होता है। अन्य वृक्षों की अपेक्षा इसमें वजन, आघात सहने की क्षमता, सतह का कड़ापन और काँटा पकड़ने की योग्यता अधिक होती है और इसको चीरने से ज्यादा नुकसान नहीं होता। इस पर नक्कासी बढ़िया होती है,किन्तु पालिश नहीं जमती। इस वृक्ष की लकड़ी का उपयोग भवन के सहतीर, कड़ी, दरवाजा, खिड़की, फ्रेम, खम्भा तथा फर्नीचर, कृषि उपकरण, नाव, जहाज, बैलगाड़ी, चक्के का धूरा, नौका-पतवार, तेल मिल, चुरूट के डिब्बे, मूर्तियाँ, खिलौने, ढोल का कनखा इत्यादि के निर्माण में होता है।
२. जलावन के रूप में
नीम की लकड़ी जलावन के काम में भी आती है, किन्तु यह धुँआ अधिक देती है। एक पचास वर्ष के नीम वृक्ष से करीब ५१ किलोग्राम जलावन की लकड़ी निकलती है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों में नीम के डाल तथा चिराई के बाद निकले छाँट आदि काष्ठ कोयला बनाने के काम आते हैं, जिसकी जलावन के रूप में वहाँ काफी माँग होती है। हैती में बड़े पैमाने पर नीम वृक्ष जलावन की लकड़ी, छाया और भू-क्षरण रोकने के उद्देश्य से ही लगाये गये हैं। उत्तरी नाइजेरिया, कैमरुन तथा सूडान में नीम वृक्ष का इमारती लकड़ी तथा जलावन की लकड़ी के उद्देश्य से वानकीकरण किया गया है। नाइजेरिया के सोकोरो प्रान्त में १९३० में नीम वृक्ष लगाये गये थे। वहाँ जलावन तथा इमारती लकड़ी के अभाव की पूर्ति में यह वृक्ष 'इस सदी का सबसे बड़ा वरदान (Greatest Boon of the Century) साबित हुआ है। भारत के गाँवों में भी जलावन की लकड़ी की समस्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। शहरों में गैस, किरोसिन, कोयला, बिजली, सौर-उर्जा आदि के उपयोग के बावजूद हर साल करीब २ करोड़ टन लकड़ी की माँग बनी रहती है। नीम वृक्ष इस अभाव की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकता है।
३. दातवन के रूप में
बनस्पति जगत् में उपलब्ध वृक्षों में दातवन के रूप में नीम की टहनी का ही सर्वाधिक उपयोग होता है, क्योंकि उसमें कीटनाशक गुण अधिक है और वह दाँत एवं मुख में होने वाले रोगों को नष्ट करने में सर्वाधिक सक्षम है। नीम टहनी का ब्रश और चीरा भी बढ़िया बनता है। उसके उपयोग से मसूड़े मजबूत होते हैं, दाँत चमकीले बने रहते हैं। बचपन से ही नीम दातवन का नियमित सेवन करते रहने वाले लोगों के दाँत अस्सी वर्ष की उम्र में भी मजबूत पाये जाते हैं। भारत के ग्राम्यांचलों में आज भी एक बहुत बड़ी आबादी नीम दातवन का ही प्रयोग करती है। बहुत से लोगों ने इसी प्रयोजन से अपने दरवाजे पर नीम वृक्ष लगा रखा है। हालाँकि गाँवों में भी कृत्रिम टूथपेस्ट एवं ब्रश का प्रचलन काफी बढ़ गया है और मंजन के नाम पर तमाम तरह के नशीले पदार्थ गुल आदि चल पड़े हैं, जबकि इनकी अपेक्षा नीम दातवन सस्ता और स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक मंजन व ब्रश है। इधर शहरों में तथा रेलवे स्टेशनों पर नीम दातवन की बहुतायत उपलब्धता को देखकर ऐसा लगता है कि प्रबुद्ध लोगों का कृत्रिम संसाधनों के बजाय नीम जैसे प्राकृतिक व गुणकारी दंत ब्रश की ओर तेजी से झुकाव बढ़ा है। बाजार में कोई भी टूथपेस्ट १०/- रुपये से कम का नहीं और एक अच्छा टूथब्रश भी २० रुपये से कम में नहीं मिलता। एक व्यक्ति के उपयोग करने पर एक टूथपेस्ट करीब एक महीना और एक ब्रश लगभग तीन महीना चलता है। इस तरह सिर्फ दंत-धवन के लिए ही एक व्यक्ति को महीने प्राय: में १६-१७ रुपये व्यय करने पड़ते हैं, जबकि नीम दातवन पर लगभग ७-८ रुपये खर्च आता है। अन्तर यह भी है कि एक कृत्रिम ब्रश का उपयोग बार-बार किया जाता है, जिससे उसमें शुद्धता नहीं रह जाती, जबकि नीम दातवन का दुबारा उपयोग नहीं किया जाता, दाँत-जीभ साफ कीजिए और फेंकिये, उसे दुबारा उपयोग के लिए धोने व रखने की झंझट नहीं।सिंथेटिक पेस्ट के रसायन तथा ब्रश का प्रयोग दाँत व मसूड़े के लिए हानिकारक भी पाये जाते हैं। नीम दातवन करने से चित्त प्रसन्न रहता है, क्षुधा तीव्र होती है और मुख से दुर्गन्ध नहीं आती। नीम टहनी दातवन के रूप में एशिया तथा अफ्रीका के देशों में उपयोग किया जाता है। इधर नीम रस से टूथपेस्ट भी बनाये जाने लगे हैं।
४. मधुमक्खी पालन में
४.१ नीम के फूलों से पराग चुनकर मधुमक्खियाँ मधु तैयार करती हैं। कुछ तिक्तता के बावजूद यह मधु स्वास्थ्य के लिए एक सर्वोत्तम टॉनिक है। गर्मी के दिनों में जब आहार की कमी हो जाती है, उस समय नीम के फूल ही मधुमक्खियों को बचाये रखने में सहायक होते हैं। बाजार में नीम मधु एक दुर्लभ चीज है, ऊँची कीमत देने पर भी यह जल्दी नहीं मिलती। नीम वृक्ष की अधिकता वाले क्षेत्र में ही नीम मधु तैयार होते हैं।
४.२ नीम का फूल हल्का हरापन लिए श्वेत और चमेली की तरह भीना सुगंध वाला गुच्छेदार होता है। इसमें द्राक्षा (Glucocide), निम्बोस्ट्रीन तथा तीक्ष्ण गंध वाले तेल एवं वसा अम्ल पाये जाते हैं। इसका अर्क उत्तेजक, पुष्टिकारक तथा क्षुधावर्धक होता है। चर्मरोग से बचने के लिए वसंत ऋतु में इसे चबाया जाता है।
५. रंजक-निर्माण में
५.१ पुराने वृक्ष के तने व डालों से स्वच्छ आकाशीय रंग का गाढ़ा लासा निकलता है, उसे 'ईस्ट इण्डिया गम' कहा जाता है। उसका उपयोग सिल्क के धागों को रंगने के काम में होता है। इससे रंजक तैयार किया जाता है। यह भी एक क्षुधावर्धक पदार्थ है। यह गोंद वृक्ष का 'आँसू' कहलाता है। गोंद में शर्करीय खमीर होता है, जो स्वास्थ्यवर्धक होता है। यह ठंढ़े जल में घुल जाता है।
५.२ नीम छाल में लाल रंग का एक रंजक पदार्थ पाया जाता है, जो सिल्क धागों को रंगने के काम में आता है। इसमें १२ से १४ प्रतिशत तक टैनिंग द्रव्य पाये जाते हैं जो चर्मशोधन के काम में आते हैं। टूथपेस्ट के निर्माण में भी छाल के रस का प्रयोग होता है। इसके तन्तुओं से रस्सा भी बनाया जाता है, किन्तु वह आर्थिक दृष्टि से उपयोगी नहीं होता।
६. पशुचारा व खली के रूप में
६.१ चारे के अभाव में बकरी, ऊँट और साँढ़ नीम के पत्ते भी चबाकर संतुष्ट हो जाते हैं। आंध्रप्रदेश के किसान गाय, भैंस तथा बकरी को प्रसव के शीघ्र बाद से लगातार कुछ दिनों तक नीम पत्ती खिलाते हैं, ताकि दूध स्वच्छ और पूरी तरह उतरे। नीम पत्ती में १२ से १८ प्रतिशत तक क्रूड प्रोटीन, ११ से ३० प्रतिशत तक क्रूड फाइब्रे, ४५ से ६७ प्रतिशत तक नाइट्रोजन, ७ से १८ प्रतिशत तक राख, १ से ४ प्रतिशत तक कैल्सियम, ०.१ से ०.३ प्रतिशत तक फास्फोरस तथा २ से ६ प्रतिशत तक अन्य पदार्थ पाये जाते हैं।
६.२ नीम बीज (बीना छिलका उतारे) पेरने पर खली में १२-१९ प्रतिशत प्रोट्रीन होता है। नीम गिरी (छिलका उतारकर) पेरने पर खली में ३५ प्रतिशत प्रोटीन होता है। पहली स्थिति में १२ से १६ प्रतिशत तेल मिलता है। दूसरी स्थिति में ३० से ४५ प्रतिशत तेल मिलता है। दूसरी स्थिति में खली पशु चारे के लिए विशेष उपयोगी है। चारे में मिलाकर इसे खिलाया जाता है। शुरू में पशु उसे थोड़ा कम पसंद करते हैं, किन्तु आदत हो जाने पर चाव से खाते हैं। इससे पशुओं का स्वास्थ्य एवं वजन बढ़ता है। इसे मुर्गी, भेड़, सुअर, व्यायी हुई गाय तथा डेयरी के गोयों, भैंसों खिलाया जा सकता है। व्यायी हुई, अर्थात दूध देने वाली गाय, भैंस को देने से पहले ढाई लीटर पानी में ८ ग्राम कास्टिक सोडा के साथ नीम खली को उबालकर देने पर उसमें तिक्तता खत्म हो जाती है।
७. सौन्दर्य प्रसाधनो में
७.१ नीम पत्ती का उपयोग विभिन्न सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण में भी किया जाता है। इसका निषेचन जर्मनी में हेयर लोशन बनाने के काम में भी आता है। इसके पानी का उपयोग सब्जियों तथा तम्बाकू के फसलों पर कीटनाशक रूप में और उपज वृद्धि के लिए किया जाता है। नीम का पाउडर भी भारत में सौन्दर्य प्रसाधन के निर्माण में काम आता है।
७.२ नीम बीज की खली पशुओं को खिलायी जाती है। इसकी तिक्तता कम करने के लिए इसे पानी में भिगोकर पानी को निथार लिया जाता है। नीम खली मुर्गीपालन के लिए भी उपयोगी है। यह क्षुधावर्धक तथा Vermicidal होता है।
८. औद्योगिक प्रयोजन में
नीम तेल रंग में पीला, स्वाद में कड़वा तथा लहसुन की गंध लिये होता है। अभी देश में जितना नीम तेल उत्पादित होता है, उसका करीब ८० प्रतिशत भाग सिर्फ साबुन बनाने के काम में आता है। इसके अतिरिक्त नीम तेल से शैम्पू, टूथपेस्ट, क्रीम, लोशन, केश तेल, नेल पालिश, राकेट ईधन आदि के निर्माण तथा वस्त्र एवं रबर उद्योग में किया जाता है। इससे म्यांमार (वर्मा) में मोमबत्ती बनायी जाती है। काठ गाड़ी का धूरा भी इससे चिकना किया जाता है। सिल्क एवं सूती वस्त्रों को गाढ़ा, पीला रंगने में भी यह तेल उपयोग में आता है। देश में प्रचलित मार्गो साबुन नीम तेल से ही बनता है। नीम को अंग्रेजी में मार्गोसा कहा जाता है।
९. अल्कोहल एवं मिथेन निर्माण में
नीम फल के गुदे में कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। इसका इस्तेमाल अल्कोहल (शराब) एवं मिथेन गैस के निर्माण में होता है। बीज का छिलका जलावन के काम आता है।
१०. छाया-विश्राम एवं सजावट के रूप में
नीम वृक्ष की छाया शीतल और उसकी हवा शुद्ध होती हैं। प्राय: सभी तरह के पशु-पक्षी इसकी छाया को बहुत पसंद करते हैं। तमाम उष्णकटिबन्धीय देशों में इसका रोपण छाया के लिए भी किया गया है, जिससे वहाँ के लोगों को जीने की ताकत मिली है। घरों के आस-पास, सड़कों के किनारे कतार में तथा पार्कों में लगाने पर यह अपनी सुनहरी हरीतिमा के कारण मनोरम दृश्य उपस्थित करता है। उत्तरी मलेशिया तथा पेनांग आदि द्वीपों में इसका रोपण इसी उद्देश्य से किया गया है। अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के कई शहरों को सुन्दर बनाने के लिए भी नीम वृक्ष लगाये गये हैं। दिल्ली सरकार ने एक बार पूरी दिल्ली में नीम वृक्ष लगाने का निर्णय लिया था, ताकि सजावट के अतिरिक्त प्रदूषण-नियंत्रण एवं ताप-नियंत्रण में भी इसका उपयोग हो। सऊदी अरब में मक्का के पास दस वर्ग किलोमीटर में ५० हजार से अधिक नीम वृक्ष लगाये गये हैं, जिसका मूल मकसद यात्रियों को छाया प्रदान करना है। हालांकि उससे ताप-प्रदूषण रोकने में भी काफी सहायता मिली है। अफ्रीका के शुष्क क्षेत्रों में यह वृक्ष सबसे पहले सड़कों के किनारे सजावटी छायादार वृक्ष के रूप में ही लगाया गया था।
११. प्रदूषण-नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण में
११.१ वायुमण्डल में कार्बनडायआक्साइड (Co2),सल्फर डायआक्साइड (So2) तथा अन्य गैसों की मात्रा-वृद्धि के साथ वायु-प्रदूषण एवं ताप-प्रदूषण के खतरे उत्पन्न होते है। नीम वृक्ष इन घातक गैसों को सहन एवं हजम करने में बहुत तेज पाया गया है। इसके सघन पत्तों से आक्सीजन भी काफी मात्रा में उत्सर्जित होता है। शहरों में सघन आबादी, वाहनों की भीड़ तथा उद्योग-धंधों की जमघट से वायु प्रदूषण के गंभीर संकट उपस्थित हैं। ऐसे जगहों पर अन्य तरह के वृक्ष इन प्रदूषणों को उतना बर्दास्त नहीं कर पाते, जितना नीम वृक्ष। शहरों के तमाम सजावटी वृक्ष प्रदूषणों की मार से नष्ट हो जाते हैं। नीम यहाँ पर एक कारगर विकल्प है। इसकी प्रतिरोधी एवं अवशोषण क्षमता के कारण ही इसे वायु शुद्धिकारक (Air Purifier) कहा गया है। नीम की सघन वानिकी होने पर यह १० डिर्ग्री सेंटीग्रेड तापमान को कम कर सकता है और वार्षिक वर्षा १० से २० प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
११.२ नीम वृक्ष ध्वनि-प्रदूषण भी रोकने में काफी सहायक है। इसकी व्यापक वानिकी से ध्वनि-प्रदूषण से होने वाले विभिन्न रोगों, जैसे- मानसिक तनाव, अनिद्रा, बेचैनी, सिरदर्द, थकान, कार्य-क्षमता के ह्लास, बहरापन, कान के आन्तरिक भागों की क्षति, हृदय की धड़कन का बढ़ना, रक्तवाहिनियों का सिकुड़ना, रक्त-संचार में कमी, उच्च रक्तचाप, चिड़चिड़ापन, गैस्ट्रिक अल्सर, मस्तिष्क एवं नर्वस कोशिकाओं पर घातक प्रभाव, स्फूर्ति का घटना, प्रसव-पीड़ा का बढ़ना, गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव आदि से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है। वायु प्रदूषण से होने वाले रोग, जैसे-सिरदर्द, चक्कर, पेट में मरोड़, कब्ज, भूख न लगना, मस्तिष्क ज्वर, बच्चों में गुर्दे की बीमारी, मन्द बुद्धिता, स्नायु दुर्बलता, दृष्टिहीनता, आँख -गले में जलन, खाँसी, यकृत विकृति, प्रजन रोग आदि में भी नीम वृक्ष की वानिकी काफी गुणकारी है। प्रदूषित जल में अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीव, विषाणु, जीवाणु, कवक, प्रोटोजोआ, कृमि आदि पाये जाते हैं, जो तमाम प्रकार के रोगों के जनक हैं। नीम वृक्ष जल-प्रदूषण रोकने में भी अत्यन्त सहायक है।
१२. फल-संरक्षण में
फलों की सुरक्षा के लिए बक्सों में नीम की पत्तियाँ रखी जाती हैं। इससे फल अधिक समय तक ताजा और निरोग बना रहता है।




१३. रोजगार वृद्धि में
नीम के व्यापक प्रचार के साथ शहरों में नीम के दातवन की माँग भी क्रमश: बढ़ती जा रही है। इसके रोजगार से गरीब व्यक्ति अच्छी आय कर सकता है। नीम बीजों का संग्रह, प्रशोधन तथा नीम पेराई और उत्पादों के व्यवसाय में भी तमाम लोगों को रोजगार मिला है। नीम पर आधारित अनेक प्रकार के लघु-कुटीर उद्योग स्थापित किये जा सकते हैं। इन उद्योगों में मशीन-निर्माण उद्योग भी हो सकते हैं, जैसे छिलका उतारने वाली मशीन (Decorticator), बीज/गिरी पेराई मशीन (Seed/Kurnel Crusher), चूर्ण बनाने वाली मशीन (Pulverizer) इत्यादी।

नीम


नीम भारतीय मूल का एक सदाबहार वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों-पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, म्यामार (वर्मा), थाईलैण्ड, इण्डोनेशिया, श्रीलंका आदि में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एवं मध्य अमेरिका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीप समूह के अनेक उष्ण तथा उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। भारतीय उपमहाद्वीप की सीमा से बाहर यह सबसे पहले १९वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तरी अफ्रीका एवं फीजी के दक्षिणी भाग में तब गया, जब हजारों भारतीय वहाँ गन्ने की खेतों में मजदूरी करने के लिए ले जाये गये। वे जाते समय अपनी संस्कृति, भाषा एवं मिट्टी की महक के साथ दैनिक उपयोग की चीजों में तुलसी का चौरा और नीम का पौध भी लेते गये। अब यह वृक्ष वहाँ का स्थानीय जैसा बन चुका है और विभिन्न उद्देश्यों से इसकी बड़े पैमाने पर वानकी होने लगी है।
नीम के पौध सन् १९०४ से १९०९ के बीच क्यूबा में और १९२१ में सूडान में भी भारत से ही गये। १९८०-९० के दशक में फिलीपाइन्स के बड़े भूभाग में भी यह वृक्ष लगाया गया। उसका बीज भी भारत, इण्डोनेशिया (जावा) और अफ्रीका (टोगो) से ले जाया गया। दक्षिण एवं मध्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में लगे करीब ५-६ हजार नीम वृक्ष भी अप्रवासी भारतीयों की ही देन है। १९८०-९० के दशक में पपुआ न्यू गुयेना के कुछ क्षेत्रों में इसे अफ्रीका, इण्डोनेशिया तथा आस्ट्रेलिया से ले जाकर लगाया गया। आस्ट्रेलिया में डेढ़ लाख से अधिक नीम वृक्ष होने की सूचना है। नाइजर के मैग्गिया घाटी में बहुत बड़े भूभाग में कई लाख नीम वृक्ष पिछले २० वर्षों में लगाये गये, जिसने वहाँ के जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है। हवाई के विभिन्न क्षेत्रों में भी अनेक वृक्ष लगाये गये हैं। उत्तरी अमेरिका के फ्लोरिडा में भी यह वृक्ष उपलब्ध है। प्रयोग के तौर पर कैलिफोर्निया ओक्लाहोमा और एरिजोना में भी कुछ नीम वृक्ष लगाये गये हैं। निकारागुआ और होण्डुरस में लगभग १० हजार नीम वृक्षों का रोपण हुआ है। दक्षिण अमेरिका के हैती में जलावन की लकड़ी, छाया एवं भूमि-क्षरण को रोकने के लिए कई हजार नीम वृक्ष लगाये गये हैं। १० साल पहले चीन के हैनन द्वीप में भी यह वृक्ष लगाया गया। अफ्रीका से बीज लाकर मध्य वियतनाम में भी कुछ नीम वृक्ष लगाये गये। मलेशिया के मेलाकाद्वीप में कुछ पुराने नीम वृक्ष पाये गये हैं और कुछ अन्य द्वीपों में उगाये भी गये हैं।
नीम वृक्ष पूर्वी अफ्रीका के सोमालिया, केन्या और तंजानिया में और उत्तरी पश्चिमी अफ्रीका के इथोपिया एवं सूडान से लेकर पश्चिमी सेनेगल और मारिटानिया तक फैल गया है। सेनेगल के शहर एवं गाँव में हजारों नीम वृक्ष १९९४ में पहली बार लगाये गये। मोजाम्बिक एवं मालाबी में भी कुछ नीम वृक्ष उपलब्ध हैं। मेडागास्कर और मारिशस के शुष्क क्षेत्रों में यह सर्वत्र पाया जाता है। इजिप्ट के नीलडेल्टा में करीब ४ हजार नीम वृक्ष १९९० के दशक में लगाये गये। सूडान में यह १९२१ में लगाया गया। नाइजर की राजधानी नेमी में यह १९४० में गया, माली में यह १९५३ में लगाया गया।
थाईलैण्ड के सड़कों के किनारे और बंगलादेश के उत्तरी हिस्से में भी नीम वृक्ष पाये जाते हैं। इरान के समुद्री किनारे, यमन के दक्षिणी हिस्से और कतर में सड़कों के किनारे भी यह वृक्ष लगाये गये हैं। सउदी अरब के मक्का में कई साल पहले ५० हजार से अधिक नीम वृक्ष पर्यावरण संरक्षण एवं छाया की दृष्टि से लगाये गये। नेपाल में प्राय: उसके दक्षिणी तरायी क्षेत्रों में तथा श्रीलंका के उत्तरी शुष्क क्षेत्रों में यह वृक्ष पाया जाता है। भारत में यह वृक्ष तो प्राय: सर्वत्र पाया जाता है। किन्तु उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद तमिलनाडु में इसकी उपलब्धता सर्वाधिक है। भारत के विभिन्न प्रान्तों में नीम वृक्ष की भारी पैमाने पर वानिकी हुई है। १९७० के एक सर्वे के अनुसार भारत में १ करोड़ ४० लाख नीम वृक्ष थे; किन्तु इस समय उसकी संख्या बढ़कर लगभग ६ गुनी हो चुकी है। अफ्रीका के सहेल क्षेत्र में आबादी से ज्यादा नीम वृक्ष हैं।
वैसे १९५९ से पहले नीम की ओर दुनियाँ के उन तमाम देशों का ध्यान बहुत ज्यादा आकर्षित नही हुआ था, जहाँ यह वृक्ष आज पाया जाता है। उस वर्ष सूडान मे टिड्डियों के एक बहुत बड़े दल ने फसलों तथा पेड़-पौधों पर हमला किया था, जिससे सब कुछ विनष्ट हो गया, किन्तु पास ही में खड़े नीम वृक्षों को कोई नुकसान नहीं पहुँचा था, यद्यपि टिड्डियाँ उन नीम वृक्षों पर भी बैठी थीं। फसलों व वनस्पति संपदा को हुए इस भारी नुकसान का परिस्थितिकीय आकलन करने के लिए सूडान सरकार के कृषि मंत्रालय ने जर्मनी के युवाकीट एवं पादप वैज्ञानिक डॉ. हेनरिख श्भ्युट्टरर के नेतृत्त्व में वैज्ञानिकों का एक टीम नियुक्त किया। डॉ हेनरिख को अपने सर्वे के दौरान यह देखकर हैरत हुआ कि सभी फसल और वृक्ष नष्ट हो गये, सिर्फ नीम ही क्यों सबूत बचा रह गया? इनकी इस जिज्ञासा ने उन्हें नीम के तत्त्वों व गुणों पर गहन अनुसंधान के लिए प्रेरित किया। आगे उनके नेतृत्व में जर्मनी के गाइसेन विश्वविद्यालय में नीम पर बहुत बड़े पैमाने पर अनुसंधान कार्य शुरू हुए, जिसमें कई देशों के सैकड़ों वैज्ञानिक एवं शोध छात्र संलग्न हुए और नीम के कई रासायनिक यौगिकों के साथ एजाडिरेक्टिन नामक उस महत्वपूर्ण कीटनाशी तत्व की भी खोज हुई जो डॉ. हेनरिख के साथ आज पूरी दुनियाँ में व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है।
१९५९ के बाद नीम पर शुरू हुए इस वैज्ञानिक अनुसंधान से विश्व के अनेक देशों का ध्यान नीम की ओर एकाएक आकर्षित हुआ और जर्मनी के अलावा अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया वगैरह में भी व्यापक अनुसंधान के साथ बड़े पैमाने पर इस वृक्ष को लगाने का अभियान भी तेजी से शुरू हो गया। इस नीम पर अब तक हुए अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलनों-जर्मनी (१८८३), केन्या (१९८६) बैंगलोर (१९९३) इत्यादि ने भी दुनियाँ में नीम की महत्ता और प्रतिष्ठा को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

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