डा. सिद्धार्थ अग्रवाल
शहरी जीवन पघति कार्बन डाइ आक्साइड तथा अन्य ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ावा देने वाली है। वर्तमान में शहरों में जिन उपकरणों का उपयोग किया जाता है उनमें से अधिकांश कार्बन डाइ आक्साइड व ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं जिससे मौसम में परिवर्तन, विशेषकर असमय वर्षा, गर्मी तथा समुद्री जलस्तर में वृद्धि होती है। लगातार बढ़ता यह शहरीकरण जलवायु परिवर्तन को और बढ़ावा देगा और बढ़ती शहरी जनसख्ंया के कारण तमाम शहर गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। शहरी क्षेत्रों के विस्तार के कारण उपजाऊ भूमि इमारतों के निर्माण हेतु उपयोग हो रही है तथा पेड़–पौधों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। अकेले भारत में ही 1955 से 2000 के बीच करीब 2.3 लाख हैक्टेयर खेती तथा वन भूमि आवासीय उपयोग में आ चुकी है। इसके कारण भी जलवायु परिवर्तन में वृद्धि हो रही है।
जलवायु में बदलाव से सूखा, बाढ़ व तूफान आदि में वृद्धि तो होगी ही, इससे कृषि उपज पर विपरीत असर पड़ेगा। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार मात्र एक डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान में वृद्धि से भारत में 40 से 50 लाख टन गेंहू की कम उपज का अनुमान है। इससे प्रति व्यक्ति खाघ उपलब्धता कम होगी और खाघ असुरक्षा तथा कुपोषण बढ़ेगा। यदि जलवायु परिवर्तनों को समय रहते कम करने तथा खाघान्न उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रभावी कदम नहीं उठाये गये तो शहरी गरीबों पर इसका गंभीर असर पड़ेगा और कुपोषित बच्चों की संख्या और भी अधिक बढ़ जाएगी।
जलवायु परिवर्तन के चलते सूखे एवं बाढ़ में वृद्धि से पानी की उपलब्धता भी प्रभावित होगी। पर्याप्त पानी के अभाव में सफाई एवं स्वच्छता रखने में कठिनाई होगी जिससे जल जनित बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा। तापमान में वृद्धि से मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है तथा अंडों से मच्छर में बदलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे मच्छरों की वृद्धि तेजी से होती है। अनुमानों के अनुसार एक डिग्री सेन्टीगेड तापमान बढ़ने से मलेरिया संक्रमण मेें दस प्रतिशत वृद्धि की आशंका है। वातावरणीय परिवर्तनों के कारण समुद्र तल भी ऊपर उठता है, जिसके कारण समुद्रतटीय नदियों में बाढ़ आती है तथा तटीय क्षेत्रों के खारेपन में वृद्धि होती है, जो लैप्टोस्पाइरोसिस बीमारी हेतु अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती है। वातावरणीय बदलावों से अनेक ऐसी बीमारियां फिर से उभर रही हैं जो पहले लगभग समाप्त समझी जाती थीं।
भारत वातावरणीय परिवर्तनों से होने वाली स्थितियों पर नियंत्रण से संबंधित योजनाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का करीब ढाई प्रतिशत खर्च करता है जो कि एक विकासशील देश के लिए काफी बड़ी राशि है। चूंकि जलवायु परिवर्तन किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है इसलिए इनमें कमी लाने हेतु सभी स्तरों पर ठोस उपायों की जरूरत है। परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का उपयोग मुख्यत: बढ़ती कार्बन डाइ आक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों के लिए जिम्मेदार है। इन गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से पृथ्वी की इन्हें अवशोषित करने की क्षमता इनके कुल उत्सर्जन की आधी रह गयी है। अत: ऊर्जा के उपयोग को कम करने हेतु सरकारी, समुदाय तथा तकनीकी विशेषज्ञों के स्तर पर प्रयासों की आवश्यकता है। सरकार पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधनों को बेहतर करके, व्यक्तिगत परिवहन के साधनों के उपयोग को हतोत्साहित करके तथा कम कार्बन डाइ आक्साइड उत्पन्न करने वाले ईंधन जैसे सीएनजी आदि की उपलब्धता को बढ़ाकर लोगों को इसके उपयोग के प्रति प्रोत्साहित करके ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकती है।
भारत में गैर परम्परागत स्रोतों जैसे सूर्य, जल एवं पवन ऊर्जा की काफी बड़ी संभावना है। पवन ऊर्जा पैदा करने की क्षमता में भारत विश्व मेें चौथे स्थान पर है। इन साधनों के प्रयोग हेतु प्रोत्साहन से भी वातावरणीय परिवर्तनों को कम करने में सहायता मिलेगी। पेड़–पौधे वातावरण से कार्बन डाइ आक्साइड को सोखने एवं जलवायु परिवर्तन को कम करने में काफी सहायक हैं। चूंकि पुराने वृक्षों की कार्बन डाइ आक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए जलवायु परिवर्तनों के नियंत्रण हेतु प्रत्येक स्तर पर आधिकाधिक वृक्षारोपण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
आधुनिक इमारतों की बनावट तथा उनमें प्रयुक्त सामग्री ऐसी होती है जिसके कारण उन्हें ठंडा रखने हेतु बिजली की अधिक खपत होती है जिसके परिणामस्वरूप ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में वृद्धि होती है। अत: कम ऊर्जा खपत वाली इमारतों के निर्माण की आवश्यकता है। भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तनों के दुष्प्रभावों को दृष्टिगत रखते हुए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना बनायी है। आशा की जानी चाहिए कि इस कार्ययोजना के प्रभावी क्रियान्वयन के फलस्वरूप भारत विश्व में हो रहे जलवायु पतिवर्तनों को कम करने के प्रयासों में सक्रिय योगदान कर पायेगा।
बुधवार, 6 अगस्त 2008
मुद्दा : कैसे हो जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण
रविवार, 18 मई 2008
ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ बने वैश्विक नीति
सुनीता नारायण (निदेशक, सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट
90 के दशक के शुरूआती दौर की वह घटना मुझे याद आती है जब बीबीसी टेलीवीजन के एक जर्नलिस्ट में मुझसे पूछा था कि जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित भारत का कौन सा क्षेत्र है जहां जाकर उनकी टीम शूटिंग कर सके। उसके इस सवाल पर आश्चर्यचकित होकर मैंने पूछा था कि क्या भारत भी जलवायु परिवर्तन की चपेट में आ रहा है? लेकिन अब मैं सोचती हूं कि अगर मुझसे इसी तरह का सवाल आज फिर पूछा जाए तो मेरे पास ऐसे तमाम इलाकों की काफी लंबी फेहरिस्त मौजूद है जहां जलवायु परिवर्तन का असर साफ–साफ देखा गया। इनमें गत वर्ष बारिश की चपेट में आए मुंबई, बंगलुरू जैसे कई मेट्रोपॉलिटन शहरों से लेकर ऐसे कई क्षेत्रों के नाम हैं जहां भीषण गर्मी और बर्फबारी जैसे गैर मामूली परिवर्तन देखने को मिले।
क्या महज यह कह देने से हमारी जिम्मेदारियों से इतिश्री हो जाएगी कि यह ग्लोबल वार्मिंग या जलवायु परिवर्तन का असर है? भारत चूंकि एक विशाल क्षेत्रफल वाला देश है जहां पैदावार अच्छी होगी अथवा सूखा पड़ेगा, इसका पूरा दारोमदार वर्षा जल पर होता है। देश की कृषि योग्य जमीन का 85 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई के लिए या तो वर्षा जल पर निर्भर है या भूजल पर। घरेलू जरूरतों, सिंचाई तथा पीने के लिए पानी हमें मौसमी बारिश से ही मिलता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा में उत्पन्न हो रही अनिश्चितता से लोग कैसे जूझ पाएंगे? फिर जिस तरह गन्ने, गेहूं तथा चावल की फसलों की सिंचाई के लिए गहरे ट्यूबवेल बनाकर भूजल का दोहन किया जा रहा है तो इस बात की क्या गारंटी है कि जलस्तर भयावह स्थिति तक नहीं पहुंच जाएगा?
पर्यावरण संरक्षण एवं इसकी जागरूकता के लिए सरकार द्वारा काफी योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है लेकिन इसके अपेक्षाकृत परिणाम नहीं निकलते। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जब तक लोग व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदारी नहीं लेंगे तब हालात नहीं सुधरेंगे। उदाहरण के तौर पर यहां महाराष्ट्र के अहमदनगर जिला के हिवारे बाजार गांव का जिक्र करना बेहतर होगा। यहां ‘चोर के हाथ में चाबी देने’ वाली कहावत चरित्रार्थ होती प्रतीत होती है। 15 साल पहले तक सूखा ग्रस्त इस गांव में सिवाए पलायन के लोगों के पास कोई दूसरा चारा नहीं था लेकिन 90 के दशक में वैज्ञानिक सोच और सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन के बाद बदलाव की बयार आई तो यह गांव आज समृद्ध दिखने लगा।
आज बोतलबंद पानी का उघोग पूरी दुनिया में फल-फूल रहा है। एक आंकड़े के अनुसार सन 2006 में अमेरिका में 11 बिलियन यानी 1.1 करोड़ डॉलर का पानी बेचा गया। अमेरिका में प्रतिदिन लगभग 60 मिलियन यानी 6 करोड़ पानी की प्लास्टिक बोतल फेंकी जाती हैं जिसकी रिसाइक्लिंग में बेतहाशा प्रदूषण को देखते हुए कुछ महीनों पहले सैन फ्रांसिस्को के मेयर ने सरकारी भवनों में इनकी बिक्री पर पाबंदी लगा दी। साल्ट लेक सिटी ने भी सरकारी कार्यक्रमों में में बोतल बंद पानी पर पाबंदी लगा दी तथा न्यूयार्क शहर में 10 लाख डॉलर के खर्च का एक अभियान चलाकर लोगों को सार्वजनिक पानी पीने के प्रति जागरूक किया गया। अमेरिका में एक मौके पर तो मशहूर पेय पदार्थ कंपनी पेप्सी को कबूल करना पड़ा कि उसके बोतलबंद ब्रांड एक्वाफिना का पानी महज टैप वाटर से ज्यादा कुछ नहीं है। भारत दुनिया में बोतलबंद पानी का दसवां सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हालांकि भारतीय परिदृश्य बोतलबंद पानी के मामले में भिन्न है और यह हमारी बहुत बड़ी विडम्बना है कि लोग प्यास बुझाने के लिए अपनी औकात से ज्यादा पैसा चुकाकर बोतलबंद पानी पीने को मजबूर हैं क्योंकि यहां सार्वजनिक वितरण वाला जल पीने योग्य नहीं है। भारत में इन कंपनियों को पानी जल निकायों से नहीं भूजल से मिलता है जो इसका अथाह दोहन कर रही हैं। मिसाल के तौर पर जयपुर के नजदीक सूखा ग्रस्त इलाके काला डेरा में बने कोका कोला प्लांट के लिए कंपनी को सिर्फ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बेकार पानी को बहाने का खर्च देना पड़ता है यानी जो किनले की बोतल हम तक 12 रूपये में पहुंचती है, उसके लिए यह राज्य सरकार को मात्र 0.02–0.03 पैसे चुकाते हैं। ऊपर से प्लास्टिक कचरे का जो पहाड़ हो रहा है और उससे पर्यावरण पर जो असर पड़ रहा है, उसकी तो किसी को चिंता ही नहीं है।
सिंचाई के मामले में कहीं न कहीं सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं और राज्य सरकारों ने ही नदियों पर बांध, नहर वगैरह बनाकर सतह के पानी का प्रबंधन तो अपने पास रखा है लेकिन आज भी लोग सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा भूजल का दोहन करते हैं। किसी की व्यक्तिगत जमीन का भूजल उसी की मिल्कियत माना जाता है। आज भी लगभग तीन चौथाई हिस्से की सिंचाई भूजल से ही की जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 1.9 करोड़ ट्यूबवेल, कुएं जैसे भूजल के स्रोत हैं। सरकार को अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करके सोचना चाहिए कि क्यों उसके प्रबंधन से केवल 35–40 प्रतिशत भूभाग की सिंचाई हो पाती है जबकि ग्राउंड वाटर से 65–70 प्रतिशत भूभाग की। जब हमने वर्षा जल संचयन के पारंपरिक तरीकों को छोड़कर नई तकनीकें अपना लीं तो उनकी कोई वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से निपटने के लिए जब तक कोई वैश्विक नीति नहीं तैयार की जाती, तब तक इस समस्या से निपटना नामुमकिन होगा। कहने को तो पिछले 17 सालों से बड़ी–बड़ी संधियां होती हैं और वादे किए जाते हैं लेकिन रहती सब बेनतीजा ही हैं। हाल में हुई बाली संधि भी बेनतीजा रही। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि ग्रीन हाउस गैसों तथा प्रदूषण नियंत्रण के वादे तो सब करते हैं मगर कोई पैमाना नहीं तय किया जाता। अमेरिका, जापान, कनाडा तथा न्यूजीलैंड जैसे कई विकसित देश यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि वे तब तक कुछ नहीं करेंगे जब तक चीन, भारत, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देश प्रदूषण नियंत्रण के उपाय नहीं करते।प्रस्तुति: मोहम्मद शहजाद
http://www.rashtriyasahara.com/NewsDetailFrame.aspx?newsid=53922&catid=35&vcatname=हस्तक्षेप
ग्लोबल वार्मिंग : कुछ तथ्य मिथ नहीं वास्तविकता
दिनेश रावत
* अब तक कई लोग समझते थे कि ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती का गरमाना एक मिथ है, हकीकत नहीं। लेकिन अब दुनियाभर के वैज्ञानिक अच्छी तरह सुनिश्चित कर चुके हैं कि हां, यह एक सच्चाई है और पृथ्वी पिछले कई सालों से विश्वव्यापी जलवायु परिवर्तन के अनेक संकेत दे रही है। पिछले साल 130 देशों के 2,500 वैज्ञानिक गहन शोध और अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मौजूदा ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य अथवा पूर्ण वजह मानवीय गतिविधियां हैं। मानवजनित ग्लोबल वार्मिंग को अक्सर ‘एंथ्रोपोजेनिक क्लाइमेट चेंज’ भी कहा जाता है।
शनिवार, 17 मई 2008
बाली में बवाल का हस्र
- शिराज केसर
इंडोनेशिया के शहर बाली में पिछले 3-14 दिसम्बर को 'जलवायु परिवर्तन' पर संपन्न सम्मेलन फिर विफलता को प्राप्त हुआ। बाली के सम्मेलन से आश लगाए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से चिंतित लोगों के हाथ फिर खाली रह गये। विकसित देशों के अंधाधुध औद्योगीकरण से दुनिया का एक बड़ हिस्सा संकट में है। प्रदूषण के मुख्य अपराधी देश बाली जैसे सम्मेलनों में आते तो जरूर हैं, पर कह वही जाते हैं-' हम तुम्हारी बात नहीं सुनेगें'। क्या इन सक्षम देशों के रवैये से विकासशील देशों में हताशा नही आएगी, पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ठीक ही कहते हैं कि ''मेरा मानना है कि इस ढांचे को उपयोग में लाना सीखना पड़ेगा। ढांचे को समर्थ्यवान बनाना होगा। यह चोरी और सीनाजोरी का दौर है।'' प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक त्रस्त शहरों में एक बाली में हुआ 'संयुक्तराष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' पूरी तरह से धनी देशों के सीनाजोरी का शिकार हो गया।
संयुक्तराष्ट्र का ढांचा खड़ा किया गया था कि दुनिया में युध्द, आपदा, जलवायु परिवर्तन आदि तरह के जो बड़े खतरे हैं, उसका मिल-जुलकर मुकाबला किया जा सके। पर इन सबमें प्राय: यह ढांचा असफल ही रहा है। एक ओर चीज जो निकलती है कि दुनिया अपने शानो-शौकत के आगे जलवायु परिवर्तन जैसी सम्स्याओं को गम्भीरता से नहीं लेती। 2-3 प्रतिशत की दर से बढ़ रही गर्मी से आने वाले तुफान की आहट सुनने के बाद भी - जलवायु परिवर्तन की इस आपदा ने पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादंश की लाखों एकड़ जमीन लील ली है। गंगा जैसी दुनिया भर की हजारों हिमनद की नदियां सूखने की कगार पर हैं।
'संयुक्तराष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' क्योटो के सबसे प्रमुख मुद्दे पर आगे का 'रोडमैप' बनाने की दिशा में एक महत्व का मोड़ था, पर चूक गये। असफलता का कारण यह झगड़ा था कि जलवायु परिवर्तन में क्या विकासशील देशों की कोई भूमिका नहीं है। अमेरिका का कहना है कि क्योटो प्रोटोकाल के अनुसार जो हम विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का स्तर 2020 तक 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर तक ले जाना है, उसमें विकासशील देशों की भी भूमिका भी तय की जानी चाहिए। बाली सम्मेलन में अमेरिका ने एक नया मसला उठाया कि इस लक्ष्य को कम करने की जरूरत है, लक्ष्य को कम करके 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर का 40 फीसदी सिर्फ किया जाना चाहिए। अमेरिका काफी हद तक सफल रहा कि नये सिरे से 'रोडमैप' बनाया जाना चाहिए और लक्ष्य का निर्धारण फिर से किया जाना चाहिए।
पर 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर का 40 फीसदी का लक्ष्य भी बहुत दूर की कौड़ी नजर आ रही है। एक अध्ययन के अनुसार '' ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की दर आज जो है उससे तो मात्र 8-10 प्रतिशत ही लक्ष्य 2020 तक हासिल कर पाएंगे। लक्ष्य के हासिल करने के लिए तुरंत विकसित देशों को 90 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना होगा और विकासशील देशों को 30 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना होगा। पर दुखद तो यह है कि सबके सब जलवायु परिवर्तन के मसले पर नाटक ज्यादा कर रहे हैं, गम्भीरता कम ही नजर आती है। जैसे कि योरोपियन संघ काफी बढ़-चढ़कर कह रहा था कि विकसित देशों के जिम्मेदारी ज्यादा महत्व की है- पर फाइनल दस्तावेज में 2050 तक 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर का आधा किया जाना चाहिए, यह जोड़ने की बात करने लगा, पर जो आखिरी दस्तावेज बना उसमें से यह बात भी निकाल दी गयी।
अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देशों को भी 90 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य की परिधि में रखा जाए जो अब तक क्योटो संधि से बाहर रहे हैं। हालांकि अमेरिकी मंशा तो अपने स्वार्थों और औद्योगिक हितों की पूर्ति के लिए ही है। पर आज समय आ गया है कि विकासशील देश भी अपनी ओर भी देखें। 'टाटा' की लखटकिया गाड़ी के लिए क्या हमारी लोलुपता नहीं है। सार्वजनिक परिवहन को दरकिनार करके कारों को बढ़ावा देकर क्या हम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बदस्तूर बढ़ाने के दोषी नहीं हैं। विष्णुनागर के अनुसार ''चीन ने तो अराजक विकास की तकनीक अपना रखी है। वहां नब्बे फीसद बिजली का उत्पादन कोयले से होता है। इसके अलावा उसने हिमालय क्षेत्र में कई ऐसी खतरनाक योजनाएं चला रखी हैं, जिनसे हिमालय की पारिस्थितिकी को बचाने की कोई नीति दुनिया में दिखाई नहीं देती। चीन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्वीकार कर चुका है कि उसके सामने पर्यावरण की गंभीर समस्याएं हैं, इसके बावजूद वह हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण की गंभीर समस्याएं हैं, इसके बावजूद वह हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली योजनाओं को गति देने में पीछे नहीं है।'' तिब्बत में रेलगाड़ी चलाने का काम कितना घातक है, शायद चीन इस पर बात करना भी नहीं चाहेगा। अमेरिका ने अपने स्वार्थ में ही, पर सवाल ठीक ही उठाया है, समय आ गया है कि सबकी जिम्मेदारी तंय हो।
फिलहाल तो हम यही आशा करते हैं कि जो 'रोडमैप' ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन के कम करने के लिए बना है, उसे सभी ईमानदारी से पालन करेंगे। अमेरिका जो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन के एक चौथाई से ज्यादा समस्या के कारण है, वह कोई किन्तु-परन्तु किए बिना, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के 2020 के लक्ष्य के लिए बना 'रोडमैप' के लक्ष्य के दिशा में आगे बढ़ेगा।
रविवार, 4 मई 2008
जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती-चिदंबरम
मिर्जापुर (वार्ता),
भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर आर. चिदंबरम ने कहा कि जलवायु में असामान्य परिवर्तन वैज्ञानिकों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है और अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कार्य नहीं हुआ तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर में जल्द ही क्लाइमेट चेंज सेंटर स्थापित करके विश्वविद्यालय के सहयोग से जलवायु परिवर्तन के विषय पर कार्य किया जाएगा।प्रो. चिदंबरम ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर में नवनिर्मित स्वास्थ्य केन्द्र का उद्घाटन करते हुए कहा कि मौजूदा समय में जलवायु में असामान्य परिवर्तन देश के वैज्ञानिकों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है और अगर समय रहते इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
प्रो. चिदंबरम ने बताया कि इस समय देश में जलवायु परिवर्तन पर वृहद स्तरीय कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है और मौजूदा वक्त में हाई रिजोल्यूशन क्लाइमेट मॉडलिंग की जरूरत है।चिदंबरम ने बताया कि स्टॉग का गठन सबसे पहले उत्तराखंड में किया गया था। वहाँ इस केन्द्र के खोलने से काफी लाभ मिला जिसके मद्देनजर चेन्नई के गाँधी गाँव में केन्द्र स्थापित किया गया है। इस केन्द्र में वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन के निर्देशन में कार्य किया जा रहा है।उन्होंने बताया कि आईआईटी गुवाहाटी व खड्गपुर में भी चेन्नई के गाँधी गाँव की तर्ज पर ही स्टॉग का केन्द्र स्थापित किए गए हैं और जल्द ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर में भी ऐसा केन्द्र खोला जाएगा।
उन्होंने बताया कि उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल में जलवायु में गैरमामूली बदलाव के चलते उत्पन्न समस्याओं के अध्ययन के लिए प्रयोगशाला स्थापित करने का प्रस्ताव सौंपा गया है। इस प्रयोगशाला पर एक करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने कहा कि थोरियम को बड़े पैमाने पर संवर्द्धित करके उससे परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करने में भारत को 20 वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है।प्रो.चिदंबरम ने कहा कि हालाँकि थोरियम को संवर्द्धित करने के लिए कलपक्कम में एक छोटा रिएक्टर तैयार कर लिया गया है और बड़े रिएक्टर के निर्माण का काम चल रहा है जिसे पूरा होने में समय लगेगा।उन्होंने कहा कि विकासशील देश होने के कारण भारत के लिए कम लागत में बिजली उत्पादित करना बहुत जरूरी हो गया है। देश में थोरियम का पर्याप्त भंडार है, मगर उसे व्यापक पैमाने पर संवर्धित करने के लिए बड़े संयंत्रों का विकास नहीं हो पाया है।काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर पंजाब सिंह ने इस मौके पर कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर में 500 बिस्तरों वाले अस्पताल स्थापित करने के लिए प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा योजना आयोग को 300 करोड़ रुपए का एक विस्तृत प्रोजेक्ट दिया गया है।
शनिवार, 3 मई 2008
ग्रीन हाउस गैसों का गहराता साया - एनएन सच्चिदानंद
दृष्टिकोण. यह मानते हुए कि देश की बढ़ती आबादी सन 2030 तक तकरीबन 1.35 अरब का आंकड़ा छू लेगी, विकास के कुछ न्यूनतम मानदंड हासिल करने के लिए अगले बीस वर्षो के दौरान भारत का औसत जीडीपी आठ प्रतिशत से ऊपर संयुक्त वार्षिक विकास दर (सीएजीआर) में रहना जरूरी है। योजना आयोग की समग्र ऊर्जा नीति रिपोर्ट के मुताबिक इसका अर्थ यह है कि 2030 तक भारत को बिजली का अपना उत्पादन मौजूदा 128000 मेगावाट से 800000 मेगावाट की क्षमता तक बढ़ाने की जरूरत है।
देश में फिलहाल 80 फीसदी बिजली का उत्पादन कोयले से किया जाता है और आने वाले वर्षो में ईंधन का प्रमुख स्रोत कोयला ही बना रहने वाला है क्योंकि लक्षित ऊर्जा उत्पादन के लिए हमारे पास इसका पर्याप्त भंडार है। बिजली के अन्य घरेलू स्रोत या तो अपर्याप्त हैं या विशाल क्षमता वाले बिजलीघरों में इस्तेमाल करने के लिए व्यावहारिक नहीं हैं। बदकिस्मती से, जिन पावर प्लांटों में कोयले का इस्तेमाल किया जाता है वहां से कार्बन डाइऑक्साइड का अत्यधिक उत्सर्जन होता है, जो ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) का मुख्य घटक है।
ग्लोबल वार्मिग के लिए ग्रीन हाउस गैसों को ही जिम्मेदार माना जाता है। भारत के लिए यह एक विकट असमंजस की स्थिति है। या तो अपने जीडीपी की विकास दर पर लगाम लगाते हुए देशवासियों के निचले जीवनस्तर से यह काम चलाए और अगले 20 वर्षो के दौरान 25 करोड़ लोगों के लिए निर्मित होने वाली रोजगार की मांग पर कोई ध्यान न दे, या फिर कोयला आधारित पावर प्लांटों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को न्यूनतम करे। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बाली में जारी संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस(यूएनएफसीसी) में बहस का मुख्य विषय ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन है।
निश्चित ही भारत यह तर्क दे सकता है कि विकसित देशों की तुलना में प्रतिव्यक्ति जीएचजी उत्सर्जन यहां काफी कम है। अमेरिका में प्रतिव्यक्ति यह दर जहां 20 टन और यूरोपीय संघ के देशों में 10 से 15 टन तक है, वहीं भारत में यह दर सालाना सिर्फ एक टन है।
ग्रीन हाउस गैसों के कुल उत्सर्जन की अगर बात की जाए तो भारत इस मामले में पांचवां सबसे बड़ा और दूसरा सबसे तेज रफ्तार मुल्क बन चुका है। दुनिया के कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में भारत का हिस्सा छह प्रतिशत है। हमारा बिजली उत्पादन कार्यक्रम उपरोक्तानुसार चलता रहा, तो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में 2030 तक चीन के बाद हम दूसरे सबसे बड़े देश होंगे।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) विकासशील देशों से पहले ही आग्रह कर चुका है कि वर्ष 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में 20 फीसदी कमी ले आएं। भारत के योजना आयोग ने इस सुझाव को अनुचित बताते हुए अमान्य कर दिया है।
यह ध्यान में रखते हुए कि भविष्य में ग्लोबल वार्मिग का सबसे बुरा असर झेलने वाले देशों में भारत शुमार होगा, जो कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर्सरकार पैनल (आईजीपीसीसी) की रिपोर्ट में भी रेखांकित किया गया है, शायद यह हमारे अपने हित में ही होगा कि अपने ताप बिजलीघरों से जीएचजी का उत्सर्जन कम करने के उपायों की पहल हम कर दें।
हालांकि यह कहना आसान है, मगर करना मुश्किल। कोयला आधारित हमारे अधिकांश पावर प्लांट पुरानी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें ताप कुशलता 25 से 30 प्रतिशत तक ही होती है। जबकि नई तकनीक पर आधारित बिजलीघरों में यह कुशलता 35 फीसदी होती है। कम ताप कुशलता के कारण ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की दर अधिक होती है।
ग्रीन हाउस गैसों को घटाने के लिए प्राय: कम ही कोशिश की जाती है, क्योंकि इसकी वजह से प्लांट की लागत 15 से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। 40 प्रतिशत से अधिक ताप कुशलता प्रदान करने वाली फ्लयूडाइस्ड बेड कम्बशन, सुपरक्रिटिकल बायलर्स और इंटीग्रेटेड गैसीफायर कम्बाइंड साइकल जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की भारत में अब तक व्यावसायिक स्तर पर शुरुआत भी नहीं हुई है।
भविष्य में बिजली उत्पादन की क्षमता बढ़ाए जाने पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन बढ़ने की चुनौती से निपटने के लिए केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय को निम्नलिखित कदम उठाने की जरूरत है- सबसे पहले विशेषज्ञों का एक कोर ग्रुप स्थापित किया जाए, जो चुनौती का सामना करने के मकसद से जरूरी वित्तीय, प्रबंधकीय और तकनीकी रणनीतियां तैयार करे। फिर इस मामले में अमेरिका के ऊर्जा विभाग (डीओई) से सहयोग लेने की कोशिश की जाए।
डीओई का जीवाश्म ऊर्जा कार्यालय (फॉसिल एनर्जी ऑफिस) जलवायु परिवर्तन की चिंताओं को बढ़ाने वाले कार्बन उत्सर्जन को घटाने के लिए दो मुख्य रणनीतियों पर काम कर रहा है। इनमें से पहली है जीवाश्म ऊर्जा प्रणाली को अधिक असरदार बनाना। इसके तहत एक ऐसा सुपर बायलर बनाया गया है जो आश्चर्यजनक रूप से 94 प्रतिशत तक ताप कुशलता अर्जित करता है।
वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ने से रोकने के लिए इन गैसों को गिरफ्त में लेना रणनीति का दूसरा हिस्सा है। ऑफिस द्वारा तीसरी रणनीति सेंटर फॉर पावर इफीशिएंसी एंड एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन के दिशा-निर्देशानुसार अंतरराष्ट्रीय संगठनों से ग्रीन हाउस गैसों के नियंत्रण पर शोध तथा पावर प्लांटों के आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करना है।
अब समय आ गया है कि सभी बिजली बिलों पर हम अधिभार लगाने पर विचार भी करें। इस राशि का उपयोग ग्रीन हाउस गैसों के नियंत्रण के प्रयासों के लिए किया जाए। बिजली की अधिक खपत करने वाला ही परोक्ष रूप से वातावरण में अधिक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार है, इसलिए सैद्धांतिक रूप से यह अधिभार उचित होगा।
-लेखक जनसमस्याओं के टिप्पणीकार हैं।
http://www.bhaskar.com/2007/12/06/0712060239_greenhouse_gasse.html
गुरुवार, 24 अप्रैल 2008
जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए ज्यादा जींस न धोएं
नई दिल्ली, 15 अप्रैल (आईएएनएस)। यदि आप जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटना चाहते हैं तो अपनी जींस को कम से कम तीन बार पहनने के बाद ही धोएं। इतना ही नहीं इसे ड्राइक्लीन करने के बजाय ठंडे पानी में धोएं और आयरन न करें।
'संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम' (यूएनईपी) ने कहा है कि ऐसा करने से तीन गुने ऊर्जा की बचत हो सकती है। इस संबंध में यूएनईपी के प्रौद्योगिकी, उद्योग और आर्थिक मंडल (यूएनईपी डीटीआईई) ने 30 सेकेंड का एक टेलीविजन कार्यक्रम भी तैयार किया है।
यूएनईपी डीटीआईई के कम्युनिकेसन प्रमुख रोबर्ट बिस्सेट ने कहा, ''हम युवाओं तक जलवायु परिवर्तन का संदेश पहुंचाना चाहते हैं। इस वैश्विक समस्या से लड़ने के लिए युवाओं तक जानकारी पहुंचनी चाहिए।''
बिस्सेट ने कहा कि जींस को कम धोने से बिजली और पानी दोनों का इस्तेमाल कम होगा। उन्होंने कहा, ''ड्रायक्लीन में 60 फीसदी ऊर्जा की खपत होती है। यदि जींस को कम धोया जाए तो ऊर्जा की 50 फीसदी तक बचत की जा सकती है जिसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। ''
उन्होंने कहा कि कपड़ा उद्योग में कई जहरीले रसायन का प्रयोग किया जाता है। कपड़ा उद्योग से पानी का अधिक उपभोग नहीं करने की भी संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने अपील की है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
शुक्रवार, 28 मार्च 2008
गरमाती धरती घबराती दुनिया - -स्वाधीन


धरती का तापमान शायद हमारे कारण बढ़ रहा है, शायद नहीं! इस संबंध में कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सका है। जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करने के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय समिति आई.पी.सी.सी.की मानें तो अधिकांश वैज्ञानिकों के अनुसार मानवीय गतिविधियाँ ही धरती को और गर्म कर रही हैं, हालाँकि इसका खंडन करने वाले कई वैज्ञानिक तथ्य भी मौजूद हैं। कारण जो भी हो, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य ने प्रकृति का न सिर्फ़ दोहन किया है, बल्कि उसको नुकसान भी पहुँचाया है। कम से कम इस बारे में प्रयासों की आवश्यकता तो अवश्य है। इसी आशय को लेकर संयुक्त राष्ट्र की देख-रेख में तैयार किया गया क्योटो मसौदा। यह प्रयास मनुष्य द्वारा पर्यावरण के हित में लिया गया बहुत बड़ा कदम है और ''दिसंबर 2006'' तक इस पर 169 देशों और सरकारी संगठनों की सहमति हो चुकी है। इसके द्वारा कार्बन डाई-ऑक्साइड और पाँच अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाई जा सकेगी। क्योटो मसौदे के अनुसार इन गैसों का उत्सर्जन विकसित देश भारी मात्रा में करते हैं। विकासशील देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैसों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन तो बहुत ही कम है।
ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि क्योटो मसौदे में बनी सर्व-स्वीकृत राय के अनुसार अभी उचित कदम न उठाए जाने की स्थिति में भविष्य में भी विकसित देश अपनी सामजिक और विकास की ज़रूरतों के लिए पर्यावरण को इसी प्रकार प्रदूषित करते रहेंगे। क्योटो मसौदे के अनुसार ''वर्ष 2008'' तक विकसित देशों को गैसों का उत्सर्जन स्तर या तो ''1990'' की स्थिति से कम से कम ''5 प्रतिशत'' नीचे लाना होगा अथवा किसी दूसरे देश को अपना तकनीकी और वैज्ञानिक सहयोग प्रदान कर उसका उत्सर्जन स्तर पर्याप्त मात्रा में कम करना होगा। यदि कोई विकसित देश ''2008'' तक ऐसा नहीं कर पाता है तो इसकी भरपाई के लिए उन्हें तकनीकी और अन्य संसाधनों के रूप में ''2008'' और ''2013'' के बीच विकासशील देशों को बड़ी कीमत चुकानी होगी। भारत और चीन जैसी तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों को इस मसौदे में विकासशील देशों की श्रेणी में रखा गया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा प्रदूषक देश है, जहाँ विश्व की ''5 प्रतिशत'' आबादी रहती है और जिसकी कुल प्रदूषण में हिस्सेदारी है ''25 प्रतिशत''! अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने क्योटो मसौदे पर हस्ताक्षर तो कर दिए हैं पर अब उसकी शर्तों पर अंतिम सहमति देने से हिचकिचा रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि चीन और भारत पर भी गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए। अमेरिका को मुख्य आपत्ति चीन से है क्योंकि चीन ही अमेरिका के बाद विश्व का सबसे बड़ा प्रदूषक है। चीन इस बारे में कहता है कि जनसंख्या के हिसाब से उसका कुल प्रदूषण में हिस्सा न केवल अमेरिका और यूरोप, बल्कि विश्व के कुल औसत से भी कम है। भारत और चीन जैसे देशों की समस्या है कि वहाँ के कानून में पर्यावरण संबंधी नियम न के बराबर हैं और जो हैं भी, उनका पालन नहीं किया जाता। यदि क्योटो मसौदे में चीन और भारत को भी हिदायतें दी जाएँ तो उनकी सरकारें भी पर्यावरण के बारे में सजग होंगी। तो इस प्रकार क्योटो मसौदे के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि विश्व में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले देश ने केवल सांकेतिक रूप से हस्ताक्षर किए हैं और दूसरे सबसे अधिक प्रदूषित देश को मसौदे के कड़े प्रावधानों से अलग रखा गया है। यह क्योटो मसौदे की सार्थकता के सामने एक प्रश्न चिह्न है। फिर भी यह कई देशों की सरकारों को पर्यावरण के मुद्दे पर जागरूक कर पाया है, यही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
पर्यावरण से जुड़े विषयों का सीधा संबंध उद्योगों और अर्थव्यवस्था से है। बचपन में पिताजी मुझे बताते थे कि अगर किसी को पैसा कमाना है तो उसे पैसा खर्च करना सीखना होगा। मैं उलझन में पड़ जाता कि अगर किसी के पास पैसा ही नहीं है वो कैसे खर्च करेगा! लेकिन सच्चाई यह है कि अमेरिका और कई यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था की बुनियाद इसी एक नियम पर टिकी है।
संयुक्त राज्य अमरीका का ''2006'' में सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जी.डी.पी.) था ''13000 अरब डालर'', भारत से लगभग ''15 गुना''! स्पष्ट-सी बात है कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था अकेले नहीं खड़ी है। चीन, जापान और भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं ने उसे सहारा दिया है। भारत और चीन में सस्ते श्रम की उपलब्धता और अमेरिका में जापान का निवेश अमेरिकी अर्थव्यवस्था को टिकाकर रखने वाले मज़बूत स्तंभ हैं।
इसी सिलसिले में एक प्रश्न पूछा जा सकता है - चीन में कितना प्रदूषण अमेरिकी और यूरोपीय बाज़ार की माँग पूरी करने के कारण होता है? फिर चीन में होने वाले प्रदूषण के लिए अकेले चीन को ही कटघरे में खड़ा करना कितना उचित है?
अब ज़रा एक नज़र अमेरिका पर भी डालें। संयुक्त राज्य अमेरिका की कुल आबादी है ''30 करोड़'' और वहाँ के परिवहन विभाग के अनुसार पंजीकृत चौपहिया वाहनों की कुल संख्या है ''25 करोड़''। चार लोगों के एक परिवार में औसतन तीन-चार गाड़ियाँ! अब ईंधन की इतनी बड़ी खपत करने वाला एक देश बाकी देशों के तेल भंडारों पर तो नज़र रखेगा ही, साथ ही प्रदूषण भी फैलाएगा। उपभोक्तावाद से ग्रस्त पश्चिमी जीवन शैली में किसी भी वस्तु की खपत उसकी आवश्यकता से कहीं अधिक होती है।
यदि आप एक कमीज़ बाज़ार में ख़रीदने जाएँ तो बहुत संभव है कि कंपनी आपको दूसरी कमीज़ सस्ते में बेचने तो राज़ी हो और आप दो कमीज़ें लेकर लौटें। विश्व की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बुनियाद यही उपभोक्तावादी सोच है। समय रहते ऐसी अर्थव्यवस्था वाले देशों को अपनी आदतों में मूलभूत परिवर्तन लाना होगा।
मैं कई बार ऐसी किसी युक्ति की कल्पना किया करता था जिससे सारी दुनियाँ की ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें पूरी की जा सकें। पर आज मुझे भरोसा हो चुका है कि ऐसी कोई युक्ति संभव नहीं क्योंकि ज़रूरतें तो पूरी की जा सकती हैं, लालच नही! निदा फ़ाज़ली ने कहा है - "लेकर तन के नाप को घूमे बस्ती-गाँव, हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव।" अब समय आ गया है कि सब यह तय करें कि हमारी आवश्यकतायें क्या हैं और परम आवश्यकतायें क्या हैं।
हम भारतवासी इससे जुड़ा सवाल यह कर सकते हैं कि हमारे पास तो हमारी आवश्यकताओं से अधिक कुछ ख़ास नहीं है, हम अपने आप को क्यों नियंत्रित करें? तो जवाब यह है कि विकसित देशों में जो हो रहा है, उससे कुछ सीख लीजिए। कहीं कल हमारी भी स्थिति उन जैसी न हो जाए। भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज़ी बढ़ती हुई दूसरी अर्थव्यवस्था है। यदि हमने भी पश्चिम के उपभोक्तावाद का अंधानुकरण किया तो सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में तो वृद्धि अवश्य होगी पर साथ ही हम अपनी विलासिताओं के दास भी हो जाएँगे। एक आम प्रवृत्ति है "यदि मैं खर्च करने की क्षमता रखता हूँ तो भला खर्च क्यों न करूँ। इतनी मेहनत आख़िर किसलिए करता हूँ?" पर ज़रा सोचिए, हम प्रकृति से जो कुछ भी पाते हैं, क्या उसकी कीमत अदा कर पाने में सक्षम हैं? जी नहीं, आप किसी वस्तु की नहीं केवल उसके रख-रखाव और साज-सज्जा की कीमत ही अदा करते हैं। उत्पाद बनाने के लिए कंपनी ने प्रकृति का जो दोहन किया उसकी तो कोई कीमत हो ही नहीं सकती।
सोमवार, 10 मार्च 2008
भूमंडलीकरण और जलवायु परिवर्तन : वंदना शिवा
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने 27 नवंबर 2007 को अपनी मानव विकास रिपोर्ट ''फाइटिंग क्लाइमेट चेंज : ह्यूमन सॉलिडेरिटी इन डिवाइडेड वर्ल्ड'' जारी की। बाली में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के कॉन्फ्रेंस से ऐन पहले जारी यूएनडीपी की रिपोर्ट में 2050 में ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन की मात्रा 1990 की मात्रा से 50 फीसदी कम करने को कहा गया है। उसमें इस लक्ष्य को हासिल करने के सुझव दिए गए हैं। विकसित देशों को अपने उत्सर्जन की मात्रा में 2050 तक 80 फीसदी कटौती करनी चाहिए, 2020 तक उन्हें 20-30 फीसदी कटौती कर लेनी चाहिए। यूएनडीपी का सुझाव है कि चीन और भारत जैसे प्रमुख ग्रीनहाउस उत्सर्जक विकासशील देशों को 2020 तक कोई कटौती नहीं करनी है और उसके बाद 2050 तक 20 फीसदी कटौती करनी है।
भारत में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को यह रिपोर्ट जारी करने को कहा गया और उन्होंने रिपोर्ट जारी भी की लेकिन उसकी सिफारिशों को खारिज कर दिया। भारत के लिए अपनी नवउदारवादी नीतियों को तैयार करते समय इक्विटी को धता बताने वाले बाजारवाद के प्रबल पैरोकार अहलुवालिया ने यूएनडीपी की रिपोर्ट को इक्विटी के नाम पर खारिज कर दिया।
''(उत्सर्जन की मात्रा में) कटौती की कोई भी ऐसी रणनीति जो पूरी तरह दुनियाभर के उत्सर्जन पर आधारित हो और जिसमें विभिन्न देशों के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आधार पर फर्क नहीं किया गया, मौलिक रूप से दोषपूर्ण है और वह समानता के सिध्दांतों के विरुध्द है।''
अगर योजना आयोग के प्रमुख ने कॉर्पोरेट लाभ की बजाय इक्विटी के आधार पर अपनी योजना बनाई होती तो वह भारत के खासकर गरीब और हाशिये पर जीने वाले लोगों के लिए बहुत मददगार होती। अगर उन्होंने पानी के निजीकरण की बजाय पानी की प्रति व्यक्ति समान मात्रा का समर्थन किया होता; अगर उन्होंने रिटेल क्षेत्र में कॉर्पोरेट रिटेल को प्रोत्साहन देने की बजाय फेरीवालों और दुकानदारों के आजीविका कमाने के समान अवसर का समर्थन किया होता; अगर उन्होंने हमारी कृषि के निगमीकरण (कॉर्पोटेराइजेशन) को प्रोत्साहन देने की बजाय भारत के छोटे किसानों को बढ़ावा दिया होता, अगर उन्होंने खाद्यान्न के वस्तुकरण और उसके वादा कारोबार को बढ़ावा देकर दो-तिहाई भारतीय बच्चों को कुपोषण का शिकार होने देने की बजाय प्रति व्यक्ति को खाद्यान्न का बराबर अधिकार दिया होता।
यह है ''इक्विटी स्किजोफ्रेनिया'' जिसके जरिए कॉर्पोरेट ग्लोबलाइजर चंद अमीर लोगों के हाथों में धन और संसाधनों को समेटने के लिए इक्विटी को तबाह करते हैं। वे चाहते हैं कि गरीब लोग, जिन्हें उन्होंने उनकी आजीविका और जमीन से वंचित कर दिया है, उस प्रदूषण की जिम्मेदारी ओढ़ें जिसे उन्होंने फैलाया नहीं। यह धन और संसाधनों का अतिपूंजीवाद और प्रदूषण का समाजवाद है। इसमें गरीब लोग अमीरों के हाथ अपने ''माल'' गंवा देते हैं और उनकी जिम्मेदारियों को विरासत में हासिल कर लेते हैं।
बोनयो के जंगलों के जलने से होने वाले उत्सर्जन और ग्रामीणों तथा स्थानीय समुदायों समेत सारे इंडोनेशियाइयों के उत्सर्जन को बराबर मानना गलत होगा। इन स्थानीय समुदायों को पाम आयल की खेती के लिए विस्थापित किया जा रहा है। ग्रीनपीस रिपोर्ट ''हाउ द पाम आयल इंडस्ट्री इज कुकिंग द क्लाइमेट'' में प्रदूषणकारियों व प्रदूषण में उनके हिस्से की पहचान की गई है। उसमें यह भी बताया गया है कि उन्हें प्रदूषण रोकने के लिए कौन से उपाय करने की जरूरत है। प्रदूषण के चलते ही जलवायु परिवर्तन हो रहा है। पाम आयल को बढ़ावा देने में सबसे बड़ा योगदान कारगिल का है। प्रॉक्टर ऐंड गैंबल, क्राफ्ट, नेस्ले और यूनीलीवर अपने उत्पादों में पाम आयल का इस्तेमाल करके वनों की कटाई को बढ़ावा देती हैं। इस व्यापार के मुख्य खिलाड़ी हैं सिनार मास और एडीएम कूक-विल्मर। सिनार मास 15 लाख हेक्टेयर पर पाम आयल की खेती करती है और 4 लाख टन पाम आयल निर्यात करती है। एडीएम कूक-विल्मर 4 लाख,93 हजार हेक्टेयर पर खेती करती है और 10 लाख टन पाम आयल निर्यात करती है।
आम इंडोनेशियाई दावानल और छोटी-मोटी आग के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। विशाल कॉर्पोरेशन देश की उत्सर्जन मात्रा में 11 फीसदी का योगदान कर रहे हैं। जब प्रदूषण का स्रोत पता चल जाए तो इक्विटी का तकाजा यही है कि प्रदूषणकारी ही उसकी कीमत चुकाएं। इक्विटी का यह मतलब नहीं है कि प्रदूषण की जिम्मेदारी को गैर-प्रदूषकों पर थोप दिया जाए।
ग्रीनपीस ने तीन ऐसे उपाय बताए हैं जिनसे प्रति वर्ष 3.8 गीगटन उत्सर्जन कम हो सकता है। यह साल में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 8 फीसदी है : पहला, दुनिया भर में वनों की कटाई में कमी की जाए; दूसरा, इंडोनेशिया में छोटी-छोटी जगहों पर आग लगाना बंद किया जाए और आग से तबाह हुए वन क्षेत्र पर खेती पर पाबंदी लगाई जाए; तीसरा, इंडोनेशिया में आग के कारण तबाह हुए वन ह्नेत्र पर फिर से वन लगाए जाएं।
आज कोई देश नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां मुख्य आथक खिलाड़ी हैं। और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी लागत कम करने और मुनाफा बढ़ाने के लिए प्रदूषणकारी काम विकासशील देश में ही करती हैं। इक्विटी का तकाजा है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा फैलाए प्रदूषण को उन्हीं की जिम्मेदारी और जवाबदेही मानी जाए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे प्रदूषण कहां फैलाती हैं। उनके द्वारा फैलाए प्रदूषण की जिम्मेदारी विकासशील देशों के गरीबों पर थोपना इक्विटी नहीं बल्कि अन्याय है।
हमें समता की अवधारण को समझ्कर कर्तव्यपरायणता की भावना लाने की जरूरत है। कर्तव्यपरायणता के साथ ही समता से ईमानदारी और स्थिरता आती है। पहला, आथक नीतियां और कार्रवाई समता पर आधारित होनी चाहिए और इसे आथक विषमता पैदा करने वालों को अपने सामाजिक, आथक तथा पर्यावरण संबंधी जिम्मेदारियों से बचने का बहाना नहीं बनना चाहिए। जो लोग देश में गरीबों को वंचित कर रहे हैं और समाज का ध्रुवीकरण कर रहे हैं उन्हें गरीबों तथा धरती को शिकार बनाते रहने के लिए विश्व मंचों पर ''इक्विटी'' लाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। जिससे गरीबों की रक्षा होती है, उसी से इस धरती की भी रक्षा होती है। जिससे गरीबों को नुकसान होता है, उससे धरती का नुकसान होता है। समता के नियम और परितंत्र के नियम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
(वंदना शिवा महिलाओं और पर्यावरण के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाती हैं)
अनुवाद - मीनाक्षी अरोरा
सोमवार, 3 मार्च 2008
ध्रुवीय भालू हो रहे हैं लुप्त
दुनिया भर में शार्कों की संख्या भी तेज़ी से घट रही है
विश्व भर में जैव विविधता की रक्षा के लिए काम कर रही एक संस्था के अनुसार ध्रुवीय भालू और दरियाई घोड़े भी अब लुप्त हो रहे जानवरों की श्रेणी में आ रहे हैं.
ऐसा पहली बार हो रहा है जब ध्रुवीय भालू और दरियाई घोडे़ को लुप्त हो रहे जानवरों की सूची में शामिल किया गया है.
वर्ल्ड कंज़रवेशन यूनियन ( आईयूसीएन ) द्वारा जारी रेड लिस्ट ऐसे कई जानवरों और पेड़ पौधों के विवरण हैं जिनके बारे में कहा गया है कि इनकी संख्या लगातार कम हो रही है.
सूची में दरियाई घोडे़ और ध्रुवीय भालू के अलावा शार्क को भी शामिल किया गया है. इतना ही नहीं यूरोप और अफ्रीका में स्वच्छ जल में रहने वाली कई मछलियों को भी इस सूची में शामिल किया गया है.
आईयूसीएन का कहना है कि जीव जंतुओं को बचाने के लिए बनी हुई समिति के बावजूद ऐसे जानवरों की संख्या बढ़ती जा रही है.
आईयूसीएन के प्रबंध निदेशक एचिम स्टेनर कहते हैं कि इस साल की रेड लिस्ट से साफ है कि जैव विविधता में तेज़ी से कमी आ रही है.
उनका कहना है कि अगर जैव विविधता में कमी जारी रही तो यह मनुष्यों के लिए काफी नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि जानवरों के लुप्त होने का प्रभाव पूरे पर्यावरण पर पड़ता है.
इस साल की रेड लिस्ट में जानवरों और पेड़ पौधों की 16, 119 प्रजातियों के नाम है.
संगठन के अनुसार जानवरों और पेड़ पौधों के लुप्त होने के लिए जलवायु परिवर्तन को दोषी ठहराया जा सकता है लेकिन इसके साथ ही साथ लोग भी ज़िम्मेदार हैं.
सर्वेक्षण से यह बात भी सामने आई है कि जो जानवर पहले से ही लुप्त हो रहे थे उनकी स्थिति और ख़राब है.
ध्रुवीय भालू के बारे में सर्वेक्षण में कहा गया है कि अगले 50 से 100 वर्षों में उनकी संख्या 50 प्रतिशत से 100 प्रतिशत की कमी आएगी. सूची में पहली बार आए दरियाई घोड़ों की संख्या पिछले एक दशक में ही 95 प्रतिशत घटी है.
स्थिति सबसे ख़राब डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में है जहां दरियाई घोड़ों को मांस के लिए मारा जाता है.
आईयूसीएन के प्रमुख वैज्ञानिक जेफरी मैकनिले के अनुसार क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण भी जैव विविधता में कमी आती है.
इसी तरह मछलियों की कई प्रजातियों की स्थिति दयनीय है और उनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है. रेड लिस्ट में मछलियों की ऐसी 537 प्रजातियों को शामिल किया गया है.
आईयूसीएन का कहना है कि शार्कों और मछलियों की कम होती संख्या चिंताजनक है और इसे रोकने के लिए जल्दी क़दम उठाना ज़रुरी है.