
जैसे ही प्यास लगती है हम पानी पी लेते हैं
जैसे ही प्यास लगती है हम पानी पी लेते हैं। पर क्या कभी ये सोचते हैं कि जो पानी हम पी रहे हैं उसका स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है? यह जरूरी है कि हमें प्रतिदिन 10-12 गिलास पानी पीना चाहिए पर अगर यह साफ व शुध्द नहीं हैं तो यह रीर पर बहुत खहाब असर डालेगा। तो चलिए आपको बताते हैं कि पानी को साफ करने की सही पध्दति क्या है? पानी साफ करने की पध्दति 1992 में आई जब यूवी तकनीक के फिल्टर्स बाजार में आए जिन्हें हम 'एक्वागार्ड' कहते हैं। इनमें अल्ट्रॉवायलेट किरणों द्वारा पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया या वायरसों को निष्क्रिय कर दिया जाता है। इसमें पानी चार स्तरों पर फिल्टर होता है:
1. सेडिमेंट फिल्टर: पानी में घुलनशील पदार्थ जैसे रेत, बजरी, जंक इत्यादि छनकर पानी से अलग हो जाते हैं। इसमें 5 माइक्रॉन का पीपी फिल्टर लगा होता है।
2. कार्बन फिल्टर: हाइली एक्टिवेटेड ग्रेन्यूलर कार्बन पानी के रंग, गंध, क्लोरीन व ऑरगेनिक अशुध्दियों को अवशोषित कर लेते हैं।
3. सेमी परमिएबल द्वारा अल्ट्रा फिल्टरेशन: .001 माइक्रॉन डायमीटर के छिद्रों द्वारा पानी में घुले हुए ऑरगेनिक केमिकल व अन्य संदूषणों जिनका आण्विक वजन 1,000 से अधिक है, उन्हें छानता है। बहुत छोटे छिद्रों के कारण बैक्टीरिया व वायरस इसके पार नहीं हो पाते। इसमें होने वाली रासायनिक क्रियाओं के कारण बनी गैसें पानी के स्वाद को कसैला कर देती है।
4. पोस्ट कार्बन फिल्टर: इस्तेमाल के समय पानी में किसी भी तरह के बैक्टीरिया के होने की संभावनाओं को रोकते हैं। साथ ही पानी के स्वाद को भी सही रखते हैं।
पानी पीने योग्य है या नहीं
पानी पीने योग्य है या नहीं यह जानने के लिए उस का टीडीएस यानी टोटल डिजोल्व सेलिड टेस्ट होना जरूरी है। जिस पानी का टीडीएस जितना कम होगा वह 'उतना ही शुध्द होगा, 'एक्वागार्ड' के बाद आई नई तकनीक है।' 'रिवर्स ऑस्मोसिस वाटर प्यूरीफायर सिस्टम' यह पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया को समाप्त कर व छानकर अलग कर देता है। इसका 6 स्तरों वाला प्रोटेक्शन पानी को फिजिकल, केमिकल और माइक्रोबायोलॉजिकल अशुध्दियों से बचाता है। इसकी स्पेशल 000.1 माइक्रॉन की आरओ मेंबरेन बीमारियां पैदा करने वाले बैक्टीरिया, सिस्ट प्रोटोजोवा के साथ ही आयनिक पार्टिकल्स, पानी में घुले पेस्टीसाइड और हैवी मेटल्स को छानकर पानी को पीने योग्य बनाता है। इसमें 2 आउटलेट हैं, एक शुध्द पानी के लिए दूसरा शुध्द पानी के लिए, इसका रेजिन कार्बन फिल्टर इस्तेमाल के समय पानी में किसी भी प्रकार की बैक्टीरिया के ग्रोथ को रोकता है।
शनिवार, 9 अगस्त 2008
कैसा पानी पीते हैं आप
मंगलवार, 29 जुलाई 2008
पानी वही, जो डायनासॉर पीते रहे
संजय वर्मा - नवभारत टाइम्स
भविष्य में भी इंसान वही पानी पी रहे होंगे, जो लाखों साल पहले धरती पर विचरते डायनासॉरों ने पीया था और अपने शरीर से बाहर निकाला था। यह एक अकल्पनीय सी संभावना है, पर इसकी अकल्पनीयता साबित करने से पहले अगर यह तथ्य देखा जाए कि पृथ्वी पर आज भी वही पानी लगभग उसी मात्रा में विद्यमान है, जितना कई लाख साल पहले था और आगे भी इतनी ही मात्रा में बचा रहेगा, तो इस संभावना में कुछ भी असामान्य नहीं लगता।
भले ही मंगल पर बर्फ और पानी मिल जाए, पर सच तो यह है कि आगे भी पृथ्वी पर पानी की मात्रा आज जितनी ही उपलब्ध रहेगी। वह बेशक कहीं बाहर नहीं जाएगा, पर तय है कि इस ग्रह पर पानी कहीं स्पेस से भी नहीं आएगा। लेकिन यहां कुछ मुश्किलें हैं। असल में, पृथ्वी पर मौजूद पानी लगातार प्रदूषित किया जा रहा है, उसके सोर्स घट रहे हैं और बढ़ती आबादी के कारण उसकी खपत में इज़ाफा हो रहा है। इसलिए सवाल यह है कि क्या आगे भी हमें ज़रूरत के मुताबिक पेयजल मिलता रहेगा?
जल संसाधनों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए साफ पेयजल की उपलब्धता एक बड़े संकट की तरह नज़र आती है, पर इसका एक हल समुद्री जल में छिपा है। धरती की दो तिहाई जगह घेरने वाले समुद्रों को देख कर यह सवाल हर किसी के मन में उठता है कि इस पानी को पीने लायक क्यों नहीं बनाया जा सकता।
समुद्रों में पृथ्वी का 97 फीसदी पानी मौजूद है। शेष पानी का बड़ा हिस्सा बर्फ के रूप में पर्वतों और पृथ्वी के ध्रुवों पर जमा है और बहुत थोड़ा सा पानी नदियों, झीलों और भूजल के रूप में हमारे पीने के लिए उपलब्ध है। पर इस सिलसिले में समुद्रों को बड़ी हसरत से देखते आए हैं। हम जानते हैं कि अगर इसमें से नमक अलग किया जा सके, तो अगली कई सदियों तक इंसानों की पानी की ज़रूरत आसानी से पूरी की जा सकती है। पर समुद्री जल से नमक को छान लेना कभी आसान नहीं रहा। वैसे तो 19वीं सदी के आखिर में यमन और सूडान आदि मुल्कों में समुद्री जल को पेयजल में बदलने का काम शुरू हो गया था, पर आज, जबकि दुनिया में डिसेलिनेशन (समुद्री जल को पीने के पानी में बदलने की प्रक्रिया) के 13080 प्लांट कायम हैं, तो भी इनसे इस्तेमाल योग्य पानी की ग्लोबल ज़रूरत का सिर्फ 0.5 फीसदी ही उत्पादित किया जा सका है।
समुद्र के खारे पानी को मीठे पानी में बदलने की यह प्रक्रिया आसान नहीं है। नमक छान कर समुद्री जल को मीठा पानी बनाने में फिलहाल थर्मल डिसेलिनेशन तकनीक को काम में लाया जा रहा है, पर रिवर्स ऑस्मोसिस के इस काम की लागत काफी ज़्यादा है। भारत जैसे देश में इस तरह डिसेलिनेशन से मिलने वाले पानी की मौजूदा कीमत 50-55 रुपये प्रति लीटर बैठती है, जो बोतलबंद पानी से कई गुना ज़्यादा है। लेकिन हम जानते हैं कि डिसेलिनेशन की लागत आगे चलकर कम होनी है। इसे कम किया ही जाना होगा, क्योंकि आखिर में हमारे पास समुद्र ही होंगे, जहां पानी होगा। वजह, भूजल का स्तर इतना नीचे हो गया होगा कि उसे वहां से खींचकर निकालना बेहद मुश्किल और बेहद महंगा होगा। सभी नदियों का जल या तो यमुना की तरह भयानक ढंग से प्रदूषित होगा या वे सूख चुकी होंगी। और झीलें-झरने तो शायद किताबों या कंप्यूटर स्क्रीनों पर ही बची रह पाएं।
लेकिन समुद्र से मिले पानी में भी यह बात कॉमन रह सकती है कि मुमकिन है उसे अतीत में डायनासॉरों ने पीया हो।