मंगलवार, 29 जुलाई 2008

पर्यावरण प्रबंधन पद्धति प्रमाणन - क्या है

अंतर्राष्‍ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) विश्‍वभर के संगठनों को उनकी गतिविधियों, उत्‍पादों और सेवाओं के पर्यावरण संबंधी प्रभावों का प्रबंध करने के लिए ढॉंचा और सतत विकास प्राप्‍त करने के लिए सबके लिए एक जैसी अंतर्राष्‍ट्रीय पर्यावरण प्रबंध पद्धति (ईएमएस) बनाना, जो पर्यावरण प्रबंधन के एक साधन के रूप में प्रयुक्‍त हो, के लिए ISO 14000 श्रृंखला के मानकों का प्रकाशन किया है । ISO 14000 आधारभूत मानकों की एक ऐसी विकासशील श्रृंखला है, जिसमें पर्यावरण संबंधी विभिन्‍न क्षेत्र शामिल हैं । ISO 14000 में छह भिन्‍न-भिन्‍न किंतु संबंधित विषयों के बारे मे बताया गया है जैसे पर्यावरण प्रबंध पद्धति (ईएमएस), पर्यावरण ऑडिटिंग (ईए), पर्यावरण निष्‍पादन मूल्‍यांकन (ईपीई), पर्यावरण लेबलिंग (ईएल), जीवन चक्र आकलन (एलसीए) और उत्‍पाद मानकों में पर्यावरण पहलू (ईएपीएस) । इसके साथ ही ये मानक प्रभावी पर्यावरण प्रबंध पद्धति को लागू करने के लिए आवश्‍यक मार्गदर्शन देते हैं ।

आवेदकों के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत

प्रस्‍तावना
भारतीय मानक ब्‍यूरो (भा मा ब्‍यूरो) भारत का एक राष्‍ट्रीय मानक निकाय के रूप मे पिछले पॉंच दशकों से अधिक समय से भारतीय उद्योग को राष्‍ट्रीय मानकों के निर्धारण और उत्‍पाद प्रमाणन योजना के प्रचालन से सेवा प्रदान कर रहा है ।
पर्यावरण के प्रति जनता की जागरूकता में वृद्धि होने के कारण IS/ISO 14000 मानकों की श्रृंखला के अनुसार भा मा ब्‍यूरो ने पर्यावरण प्रबंध पद्धति (ईएमएस) प्रमाणन आरंभ किया है, जो किसी संगठन की प्रक्रिया में निर्णय लेने के लिए महत्‍वपूर्ण तत्‍व बन गया है । ये मानक पर्यावरण प्रबंध पद्धति पर अन्‍तर्राष्‍ट्रीय रूप से स्‍वीकृत ISO 14000 मानको की श्रृंखला के अधिग्रहण और समान है ।
इस योजना में IS/ISO 14001 के अनुसार पर्यावरण प्रबंध पद्धति प्रमाणन लाइसेंस की स्‍वीकृति दी जाती है जो ISO 14001:1996 के समान है ।

ISO 14001:1996 “पर्यावरण प्रबंध पद्धति – उपयोग के लिए मार्गदर्शन सहित विशिष्टि

ISO 14001:1996 कार्यान्‍वन किया जाना चाहिए, जिससे कानूनी और नियामक अपेक्षओं के अनुपालन/अनुरूपता, पर्यावरण निष्‍पादन में सतत सुधार के लिए संगठन की क्षमता का पता चल सके । यह मानक संगठन को आवधिक पुनर्विचार और पर्यावरण प्रबंध पद्धति (ईएमएस) के मूल्‍यांकन के लिए उत्‍साहित करता है जिससे सुधार और उनके कार्यान्‍वन के अवसरों की पहचान हो सके । यह पद्धति आधारित मानक है, जो किसी संगठन को उसके पर्यावरण प्रभाव/मुद्दे के प्रबंध के लिए ब्‍लू-प्रिंट देता है ।
ईएमएस सतत सुधार की प्राप्ति के लिए ढांचागत प्रक्रिया प्रदान करता है, जिसकी दर और सीमा संगठन के द्वारा सामाजिक-आर्थिक और अन्‍य परिस्थितियों के प्रकाश मे निर्धारित किया जा सकता है ।
समग्र प्रबंध पद्धति सहित पर्यावरण विषयों का एकीकरण पर्यावरण प्रबंध पद्धति के प्रभावी कार्यान्‍वन में सहयोग देता है ।

प्रमाणन कैसे प्राप्‍त करें
आवेदन पत्र और उसकी प्रक्रिया
वह संगठन जो IS/ISO 14001 के अनुसार पर्यावरण प्रबंध पद्धति (ईएमएस) के लिए लाइसेंस प्राप्‍त करना चाहता है, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे इस मानक के अनुसार ईएमएस का प्रचालन कर रहे हैं । संगठन को भा मा ब्‍यूरो के निकटतम क्षेत्रीय कार्यालय में निर्धारित आवेदन शुल्‍क, जैसा लागू हो, सहित तिहरे (फार्म IV) में निर्धारित प्रोफार्मा पर आवेदन करना चाहिए । प्रत्‍येक आवेदन पत्र के साथ प्रलेखित पर्यावरण प्रबंध पद्धति ( जैसे पर्यावरण मैनुअल आदि) के साथ पूरक प्रश्‍नावली (फार्म VII) आवश्‍यक है । शुल्‍क की सूची निम्‍नलिखित अनुसार है। आवेदन पत्र अहस्‍तांतरणीय है। कृपया आवेदक पत्र और प्रश्‍नावली उपमहानिदेशक (अपने क्षेत्र) को भेंजे ।
आवेदन पत्र में संगठन के मालिक, भागीदार अथवा मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अथवा संगठन की तरफ से कोई अन्‍य व्‍यक्ति जिसे हस्‍ताक्षर करने का प्राधिकार दिया हो, हस्‍ताक्षर होने चाहिए । आवेदन पत्र में हस्‍ताक्षर करने वाले व्‍यक्ति के नाम और पदनाम आवेदन-पत्र में दिए खाली जगह में स्पष्‍ट रूप से लिखे जाने चाहिए । लाइसेंसधारी नवीकरण आवेदन पत्र को इस वेबसाइट से डाउनलोड कर सकते हैं ।
http://www.bis.org.in

मुनाफा नहीं, पर्यावरण है सुजलॉन का मकसद

कारोबार बढ़ाने के लिए कंपनी का संचालन कारोबारी घरानों नहीं बल्कि अमेरिकी या यूरोपीय मॉडल पर होगा

ब्लूमबर्ग



पुणे में कंक्रीट की पांच मंजिला इमारत में अचानक बिजली चली जाती है और अंधेरा हो जाता है। लगभग 30 सेकंड बाद बैकअप जेनरेटर चालू होता है और लाइट जलती है।


यह नजारा है दुनिया की शीर्ष पांच टरबाइन निर्माता कंपनियों में से एक भारतीय कंपनी सुजलॉन के मुख्यालय का। कंपनी के संस्थापक तुलसी तांती ने कहा 'हमारे लिए तो यह रोज का काम है। देश में अपने कारोबार को बढ़ावा देने के लिए आपको देश में मौजूद संसाधनों की सीमाओं को जानना पड़ता है।'

50 वर्षीय तांती ने एक दशक पहले बिजली की कटौती और इसकी बढ़ती कीमतों से जूझती हुई भारतीय कंपनियों को पवन चक्कियों की आपूर्ति करना शुरू किया था। वर्ष 1993 में गुजरात में अपनी टेक्सटाइल कंपनी के बढ़ते बिजली बिल को कम करने के लिए दो पवन चक्कियां खरीदी थी। तांती ने कहा, 'दो साल में ही हमें इस क्षेत्र में मौजूद आर्थिक संभावनाओं का अंदाजा हो गया था। तब हमने इसी क्षेत्र पर ध्यान देने के बारे में सोचा।'

साल 1995 में सुजलॉन की स्थापना हुई और आज सुजलॉन इस क्षेत्र में दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी कंपनी है। विंड टरबाइन निर्माता कंपनियों के लिए मांग के साथ तालमेल बिठाना काफी मुश्किल हो रहा है। कच्चे तेल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल होने से और लगातार बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग से विंड टरबाइनों की मांग में तेजी से इजाफा हो रहा है।

चीनी बाजार पर नजर


पिछले साल चीन की सरकार ने साल 2020 तक देश की कुल ऊर्जा खपत का लगभग 15 फीसदी पवन ऊर्जा के जरिये किया जाए। जनवरी में यूरोपीय संघ ने भी कार्बन रहित ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाकर 2020 तक 20 फीसदी करने की मंजूरी दी थी। साल 2005 तक यह आंकड़ा 6 फीसदी ही था। साफ सुथरी ऊर्जा के इस्तेमाल के निर्देशों का पालन करने के लिए लगभग सभी कंपनियां अब पवन ऊर्जा के इस्तेमाल को तरजीह दे रही हैं। कंपनी इस बाजार में मौजूद संभावनाओं को भुनाना चाहती है।

फर्श से अर्श तक


गेहूं की खेती करने वाले किसान के घर पैदा हुए तुलसी तांती और यूबी समूह के चेयरमैन विजय माल्या में कुछ समानताएं हैं। हाई स्कूल के बाद तुलसी ने एक सरकारी पॉलीटेक्नीक संस्थान से इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग डिप्लोमा लिया। साल 2005 में सुजलॉन का आईपीओ आने के बाद तांती और उनके परिवार की कुल संपत्ति लगभग 95 अरब रुपये की हो गई है।

लेकिन इन सबके बावजूद तांती चकाचौंध से दूर रहते हैं। सुजलॉन के चेयरमैन पुणे में अपनी पत्नी के साथ चार बैडरूम वाले अपार्टमेंट में रहते हैं। जहां पर 4,000 वर्ग फीट जमीन की कीमत लगभग 6 करोड़ रुपये है। उनसे छोटे तीन भाई सुजलॉन में कार्यकारी हैं और इसी इमारत के दूसरे अपार्टमेंट में रहते हैं। पुणे में अपने छोटे से दफ्तर से तांती बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए अपनी कंपनी का विकास और तेजी से करने की कोशिश कर रहे हैं।

सुजलॉन के दुनिया भर में लगभग 13,000 कर्मचारी हैं और कंपनी उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और चीन में उत्पादों का निर्यात करती है। कंपनी की योजना साल 2013 तक वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी 25 फीसदी करने की है। इसके साथ ही कंपनी विंड टरबाइन के बाजार में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी कंपनी बन जाएगी। तांती ने कहा, 'तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमें भी तेजी से काम करना होगा। इसीलिए इस समय तेजी से विकास हमारा पहला लक्ष्य है न कि मुनाफा कमाना।'

नहीं पसंद भाई-भतीजावाद

अपना साम्राज्य खड़ा करने वाले तांती बाकी भारतीय कारोबारियों से अलग हैं। जब तांती रिटायर होंगे तो वह अपने कारोबार की बागडोर अपने बच्चों के हाथों में नहीं सौपेंगे। तांती के दो बच्चे हैं और दोनों ही हाँग काँग में हैं। 23 साल का बेटा प्रणव मेरिल लिंच ऐंड कंपनी के लिए काम करता है और 22 साल की बेटी निधि क्रेडिट स्विस ग्रुप के लिए काम करती है।

इस बारे में तांती कहते हैं, 'मैंने वह काम नहीं किया जो मेरे पिताजी करते थे। मेरे बच्चे भी मेरे नक्शेकदम पर नहीं चलेंगे। सुजलॉन का संचालन पूरी तरह से एक व्यावसायिक टीम करेगी। निदेशक मंडल में परिवार का एक सदस्य रहेगा। हम इस कंपनी को अमेरिकी या यूरोपीय कंपनी की तरह ही चलाएंगे।'
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रविवार, 18 मई 2008

ग्लोबल वार्मिंग से कुल्लू के सेब पर प्रतिकूल असर

विकास शर्मा / चंडीगढ़
ग्लोबल वार्मिंग के कारण कुल्लू इलाके में सेब व्यवसाय इन दिनों घाटे का सौदा साबित हो रहा है। कभी मुनाफे के लिए मशहूर इस सौदे के बगान मालिकों को नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी के कारण होने वाले ग्लोबल वार्मिंग से इस इलाके में अब सेब का उत्पादन ऊपर के क्षेत्रों में हो रहा है। पहले सेब का उत्पादन मंडी, भूनतर, कुल्लू जैसे इलाकों में होता था। लेकिन अब यह उत्पादन मनाली में हो रहा है।
रॉयल डेलिसियस, रेड डेलिसियस व गोल्डन डेलिसियस नामक सेब को उगाने वाले कुल्लू के किसान इन दिनों कोई और फसल उगाने को विवश है।
कुल्लू में सेब बगान के मालिक अनिल ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण उनकी बीस बीघा की फसल सूख गई और वे अब किसी और फसल की ओर रुख करने को मजबूर है। अनिल इस मामले में अकेले नहीं है।
इस बदहाली का सामना और भी कई बगान मालिक कर रहे हैं। कभी उम्दा किस्म के सेब उत्पादन के लिए विख्यात कुल्लू इन दिनों अन्य उत्पादन का विकल्प तलाश रहा है। क्योंकि सेब का उत्पादन अब ऊंचाई वाले इलाकों में स्थानांतरित हो गया है।
हिमाचल प्रदेश का बागवानी विभाग भी उनकी बातों से सहमत है। वहां के कर्मचारियों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कुल्लू इलाके में सेब के उत्पादन में 15 से 20 फीसदी की गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि सेब की फसलों को एक सीजन में 1200 घंटे की ठंड की जरूरत होती है।
लेकिन बढ़ते तापमान से यहां की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बीते दस सालों से इस इलाके में प्रतिवर्ष एक डिग्री तापमान बढ़ रहा है। गर्मी में जहां पहले अधिकतम तापमान 25 डिग्री सेल्सियस होता था वही यह बढ़कर 35 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया है।
एक अन्य बगान मालिक नकुल खुल्लर ने बताया कि बीते पांच सालों में सेब उत्पादन के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है।
पहले सेब की खेती 4000 फीट की ऊंचाई पर होती थी लेकिन अब यह 5000 फीट की ऊंचाई पर की जा रही है।
कुल्लू बागवानी विभाग के उपनिदेशक बीएल शर्मा ने इस बारे में बताया कि यह सही है किकुल्लू के कुछ इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ा है लेकिन यहां के किसानों ने सेब की तुलना में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों की ओर भी अपना रुख कर लिया है।
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अमेरिका में भी बढा अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल

बीएस संवाददाता / न्यूयार्क विंड टर्बाइन निर्माण क्षेत्र की भारतीय कंपनी सुजलोन एनर्जी लिमिटेड और लंदन स्थित क्लीपर विंडपावर पीएलसी द्वारा खराब उपकरण भेजे जाने के कारण एडिसन इंटरनेशनल को नुकसान हुआ है। एडीसन इंटरनेशनल की एडीसन मिशन एनर्जी ने प्रतिभूति और विनिमय आयोग से कहा कि सुजलोन कं पनी की 275 सुजलोन 2.1 मेगावॉट टर्बाइनों के रोटर ब्लेड्स टूट रहें है और उन्हें ठीक करने या बदले जाने की जरुरत हैं। क्लीपर ने एडीसन को पहले ही उसकी 2.5 मेगावॉट क्षमता की 71 टर्बाइनों को हटाने के लिए कहा है। क्लीपर की टर्बाइनों में भी रोटर ब्लेड्स और गियरबॉक्स संबंधित खामियां थी।
अमेरिकी सरकार द्वारा ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम किए जाने पर जोर देने के बाद से अमेरिका में अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल में तेजी आई है। अमेरिकन विंड एनर्जी एसोसिएशन के मुताबिक पिछले साल इस आंकड़े में 45 फीसदी की वृद्धि हुई है और इससे रिकॉर्ड 5,244 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हुआ था।
एडीसन कंपनी द्वारा आयोजित विश्लेषकों और निवेशकों की बैठक में कंपनी के मुख्य टेड क्रेवर ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से हम अपने उपकरणों की आपूर्ति में आयी खामी से जूझ रहे हैं। हमारे सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती है खराब टर्बाइनों को बदलकर नई टर्बाइनों से काम शुरू करना।
इंसटालेशन टार्गेट
टर्बाइनों की आपूर्ति में आई खराबी के कारण कंपनी की 2009 तक 2 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन करने की योजना अभी अधर में लटक गई है। एम्सटर्डम में सुजलोन के प्रवक्ता विवेक खेर ने इस मामले पर कोई भी प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया। जबकि लंदन स्थित क्लीपर के प्रवक्ता पैट्रिक डी एनकोना ने कहा कि उनकी कंपनी ने एडीसन से बात कर ली है और हम अपने ग्राहकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराना चाहते हैं।
क्लीपर ने दिसंबर में कहा था कि 35 टर्बाइनों के रोटर ब्लेड्स में खराबी आने के कारण उनकी आपूर्ति नही की गई थी। कंपनी उन टर्बाइनों की मरम्मत पर लगभग 60 करोड़ रुपये खर्च करेगी। कंपनी इओवा स्थित निर्माण इकाई की क्षमता को दोगुना करना चाहती है। कैलीफोर्निया स्थित कंपनी के मुनाफे में 27 प्रतिशत की गिरावट हुई हैं।
पॉसिबल पेनाल्टीज
परियोजनाओं में देरी की वजह से कंपनी बिजली खरीद समझौतों में नुकसान हो सकता है। एडीसन ने बताया कि टर्बाइन आपूर्ति करने वाली कंपनियों ने उन्हें पांच साल की वॉरंटी दी है, पर यह कितना खर्च पूरा कर पाएगी यह कहना मुश्किल है। पिछले साल दिसंबर तक एडीसन के 566 मेगावॉट वाले एक संयंत्र में मरम्मत का काम हो रहा है और 477 मेगावॉट के दूसरा संयंत्र में अभी निर्माण कार्य चल रहा है। कंपनी ने 1,166 मेगावॉट बिजली उत्पादन क रने के लिए टर्बाइनों की खरीद का काम शुरू कर दिया है।

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