विकास की रफ्तार बहुत तेज हुई है उसका श्रेय विज्ञान को ही है। सृष्टि संतुलन की समस्या का श्रेय भी विकास की आंधी को ही है। असंतुलित विकास को एक नदी का प्रवाह मानें तो बाढ़ का खतरा हो रहा है। मानवीय मूल्य और पर्यावरण ये दोनों तटबंध टूट गये हैं। अब जल प्रवाह की रोकथाम करना संभव नहीं है। मानवीय मूल्यों के विकास और पर्यावरण की सुरक्षा के साथ-साथ जो विकास होता है, वह संतुलित विकास है। उससे महत्वकांक्षा अथवा आर्थिक स्पर्धा ने मानवीय मूल्यों का पर्यावरण दोनों की उपेक्षा की है फलतः सृष्टि संतुलन की समस्या उत्पन्न हूई है। विकास के प्रति वर्तमान दृष्टिकोण सम्यक नहीं है। वह संवेग के अतिरेक से प्रभावित है। अप्रभावित चिंतन और अप्रभावित बुद्धि का निर्णय सही होता है। संवेग की अतिरेक दशा में चिंतन और बुद्धि दोनों निष्क्रिय हो जाते हैं। इस निष्क्रियता की भूमिका पर होने वाला विकास मानवीय सभ्यता और संस्कृति के लिए वरदान नहीं होता। औद्योगिक और आर्थिक विकास ने कुछ समस्यायें सुलझायी है।
आज रोटी, कपड़ा अधिकांश गरीबों की झोपड़ी तक पहुंच रहे हैं। मकान की समस्या अभी भी बनी हुई है। फिर भी यह करने में संकोच नही होगा - आर्थिक विकास ने अमीरी को बढ़ावा देने के साथ-साथ गरीबी को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में संपत्ति और उपभोग के साधनों पर अल्पसंख्यक व्यक्तियों को अधिकार है। बहुसंख्यक लोग उस अधिकार से वंचित है। विकसित राष्ट्र जितनी साधन सामग्री का उपभोग कर रहे हैं, उससे न्यूनतर उपभोग सामग्री विकासशील राष्ट्रों के पास है और अविकसित राष्ट्रों के पास न्यूनतम। गरीबी की अनुभूति और उससे उत्पन्न असंतोष आज जितना जटिल है उतना अतीत में नहीं था। वह असंतोष प्रकृति के नियमों को भंग करने का हेतु बन रहा है। हर व्यक्ति येन केन प्रकरेण अमीर बनना चाहता है उस धन में जंगलों की कटाई हो सकती है फैक्ट्रियों का कचरा नदियों में प्रवाहित कर जल को दूषित किया जा सकता है और भूमि का मर्यादाहीन खनन किया जा सकता है और सब कुछ हो रहा है। हम संवेगातिरेक की समस्या को सुलझाये बिना अनैतिकता अथवा अप्रमाणिकता की समस्या को नहीं सुलझा सकती।
अनैतिकता की समस्या को सुलझाये बिना सृष्टि संतुलन और पर्यावरण की समस्या को नहीं सुलझा सकते। बढ़ती आबादी स्वयं एक समस्या है आदमी की प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये बड़े उद्योगों की जरूरत है इसलिए विकास की सीमा को निर्धारित नहीं किया जा सकता। इस तर्क के पीछे छिपी हुई सचाई को कोई व्यक्ति अस्वीकार नहीं करेगा। हम समस्या के दूसरे पक्ष पर विचार करे। लोभ एक तीव्र संवेग है। उसकी प्रेरणा ने विकास की अवधारणा को जो आधार दिया है उसे सीमित करना आवश्यक है। हमारा अभिमत है कि असंतुलित संवेग और असंतुलित विकास की अवस्था में प्रकृति के साथ जीने की कल्पना कठिन हो जाती है। आज का करणीय कार्य यह है कि हम लोभ के संवेग के साथ करुणा के संवेग को जागृत करें। लोभ के संवेग को नियंत्रित करने का शक्तिशाली अस्त्र करुणा, अहिंसा मैत्री है। महावीर ने कहा था छोटे से छोटा जीव के अस्तित्व को अस्वीकार मत करो और अपने अस्तित्व को भी अस्वीकार मत करो जो दूसरे जीव के अस्तित्व को अस्वीकार करता है जो अपने अस्तित्व को अस्वीकार करता है वह दूसरे जीव के अस्तित्व को अस्वीकार करता है।
नैतिक मूल्यों को ह्रास -
दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने वाला ही प्रकृति के साथ जी सकता है कुछ चिंतकों का तर्क है बुद्धिमान मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करता है, विकास के लिए वैसा करना जरूरी है। वह प्रकृति में होने वाली क्षति की पूर्ति करना भी जानता है इसलिए विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता है। उसकी कोई सीमा नहीं हो की जा सकती। यह चिंतन अर्थहीन नहीं है ऊर्जा का व्यय होता है तो उसके नये स्रोत खोजे जा सकते हैं जंगलो की कटाई होती है तो नये जंगल तैयार किये जा सकते हैं।
नई दिशा -
विश्वविद्यालय की शिक्षा ने बौद्धिक विकास और वैज्ञानिक विकास के नए द्वार खोले हैं। हम इस युग के चिन्तन मंथन और सुविधा की प्रचुर सामग्री से संतुष्ट है इसलिए इस दिशा में निरंतर आगे बढ़ने की बात सोच रहे है। तनाव, भय, अपराध और मादक वस्तुओं के सेवन की प्रवृत्ति संकेत दे रही है कि मनुष्य के भीतर भयंकर असंतोष है और वह असंतोष मनुष्य को प्रकृति के साथ अन्याय करने के लिए विवश कर रहा है।
सुख की अवधारणा -
जब तक इन्द्रियजन सुख संवेदना के आधार पर चलने वाली जीवनशैली होगी तब तक हम प्रकृति के साथ जीने की बात संगोष्ठियां और संभाषणों में भले ही करें यथार्थ के धरातल को वह प्रभावित नहीं कर पायेगें। इन्द्रिय चेतना के स्तर से ऊपर उठकर चिंतन करने का अर्थ होगा सुख की अवधारणा में परिवर्तन।
मध्यम मार्ग - प्रकृति के साथ होने वाले व्यवहार में सब वैज्ञानिक और विचारक एक मत नहीं है। कुछ विचारकों का मत है - प्रकृति के प्रकोप को शांत करने की विधियां हमारे पास है इसलिए पर्यावरण प्रदूषण की विभिषिका विकास की यात्रा में बाधा नहीं बन सकती।
मंगलवार, 29 अप्रैल 2008
जीवनशैली को सर्वांगीण बनायें, प्रकृति को बचाएं
आपदाओं से बचाते है मैन्ग्रोव वन - डा. चन्द्रशीला गुप्ता
आम आदमी का मैन्ग्रोव शब्द से कोई खास परिचय नही होता है। यहां तक कि कुछ लोग शब्द का विश्लेषण ‘आम के पेड़ों का वन’ के रूप में कर लेते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि मैन्ग्रोव पुर्तगाली शब्द मैन्ग्यू अर्थात् कम विकसित या ठिगने बड़े पौधों का समूह से बना है। हिन्दी में हम इन्हें कच्छीय वनस्पति कहते हैं। ये विशिष्ट प्रकार की वनस्पतियां हैं जो खारे पानी को सहन कर सकती है और समुद्री पानी में आंशिक रूप से डूब जाने पर भी जीवित रह सकती है। ये जंगल समुद्र तटों पर नदियों के मुहानों व ज्वार प्रभावित क्षेत्रों में पाये जाते हैं। समुद्री पानी के रासायनिक गुणधर्म काफी भिन्न होते हैं। इसमें लवण ज्यादा होते हैं और नाइट्रोजन की बेहद कमी होती है दरअसल नाइट्रोजन के बिना तो जीवन संभव नहीं है। मगर समुद्र में इसकी कमी नदियों द्वारा बहाकर लाए गए मृत जैविक पदार्थ पूरा करते है। यही वजह है कि नदी का मुहाना काफी उपजाऊ क्षेत्र होता है जबकि मुख्य भूमि से दूर समुद्री पानी काफी अनुत्पादक होता है जहां केवल कोरल जैसे स्वपोषी ही पनप सकते हैं। इन उपजाऊ क्षेत्रों में प्रकृति ने यहां की विशिष्ट परिस्थिति के साथ तालमेल बैठाकर अपने ही प्रकार की अनोखी वनस्पति मैन्ग्रोव को जन्म दिया।
मुर्गी पहले या अंडा?
मैन्ग्रोव वनस्पतियां समुद्र तट को आगे बढ़ाने की अदुभुत क्षमता रखती है लेकिन यह कहना कठिन है कि मलबा इनके कारण जमा हुआ या मलबे के कारण इन्होंने जड़ पकड़ना शुरू किया। प्रश्न कुछ ऐसा ही है कि पहले मुर्गी पैदा हुई या अण्डा? लेकिन फिर भी यह तथ्य है कि जब एक बार यह वनस्पति किसी स्थान पर विकसित हो जाती है तब नदियों द्वारा लाया गया मलबा वहां लगातार जमा होने लगता है। धीरे-धीरे वहां जमीन ऊपर उठने, लगती है, वनस्पतियां सक्रिय होने लगती है। समुद्र तट का यह भाग ठोस रूप धारण करने लगता है, एक अंतराल पश्चात यहां डेल्टाओं का उद्भव होता है। मैन्ग्रोव के तने के ऊपरी भाग से बहुत सारी जड़े निकलकर नीचे की ओर झुकते व फैलते हुए मलबे तक पहुंचकर जम जाती है। नई जड़ों का कुछ भाग मलबे या दलदल की सतह के बाहर होता है। इसमें मौजूद छिद्र श्वसन में मदद करते हैं। जड़ का मलबे के भीतर का हिस्सा मृदा बनाता जाता है और नई जड़ों से नए पेड़ों के तने उगते जाते हैं। इन पौधों में बीज अंकुरण के लिये बड़ी सुरक्षित विधि अपनाई गयी है। बीज गिरने से पहले ही अंकुरित होना शुरू हो जाता है। फायदा यह होता है कि दलदल में गिरने के साथ ही ये अपनी जड़े जमा लेते है। इसके अलावा बीज में गूदे की ज्यादा मात्रा होने से थोड़े भारी होते हैं और दलदल में गिरने पर भीतर गहराई में धंस जाते हैं।
लवण सहनशीलता -
मैन्ग्रोव के तने के ऊपरी भाग से बहुत सारी जड़े निकलकर नीचे की ओर झुकते व फैलते हुए मलबे तक पहुंचकर जम जाती है। नई जड़ों का कुछ भाग मलबे या दलदल की सतह के बाहर होता है। इसमें मौजूद छिद्र श्वसन में मदद करते हैं। जड़ का मलबे के भीतर का हिस्सा मृदा बनाता जाता है और नई जड़ों से नए पेड़ो के तने उगते जाते हैं। इन पौधों के बीज अंकुरण के लिये बड़ी सुरक्षित विधि अपनाई गयी है। बीज गिरने के पहले ही अंकुरित होना शुरू हो जाता है। फायदा यह होता है कि दलदल में गिरने के साथ ही ये अपनी जड़े जमा लेते है। इसके अलावा बीज में गूदे की ज्यादा मात्रा होने से थोड़े भारी होते हैं और दलदल में गिरने पर भीतर गहराई में धंस जाते हैं।
लवण सहनशीलता -
मैन्ग्रोव वनस्पतियों में लवण सहनशीलता का विशेष गुण होता है। समुद्र तट रेखा के नजदीक ज्वार का प्रभाव सबसे अधिक होता है और स्थलीय भाग की और बढ़ने पर धीरे-धीरे पानी या दलदल में नमक की मात्रा कम होती जाती है। इसलिये सबसे ज्यादा लवण सहृ पेड़ समुद्र तटीय रेखा पर पाए जाते है। फिर कम लवण सहृ पेड़ क्रमिक रूप से (नमक स्तर घटने के अनुसार) अलग-अलग समूह में रहते हैं। जहां से जमीन ऊपर उठना शुरू हो जाती है। यानी खारा पानी नीचे रह जाता है। वहां मैन्ग्रोव क्षेत्र समाप्त हो जाता है। मैन्ग्रोव वनों की बदौलत समुद्र तट आगे बढ़ना शुरू हो जाते है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप ही प. बंगाल व बांग्लादेश के दक्षिण भू-भाग ने 5000 वर्ष पूर्व समुद्र से उभरना आरंभ करते हुए वर्तमान स्वरूप लिया है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार अपने प्रारंभिक चरण में बिहार की राजमहल पहाड़ियों से लेकर बांग्लादेश के दक्षिणी भू-भाग ने 5000 वर्ष पूर्व समुद्र से उभरना आरंभ करते हुए वर्तमान स्वरूप लिया है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार अपने प्रारंभिक चरण में बिहार की राजमहल पहाड़ियों से लेकर बांग्लादेश के सिल्हट क्षेत्र तक का इलाका ऊंची-नीची जमीन से जुड़ा एक समुद्री ताल था।
गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा भारी मात्रा में लाए गए मलबे के लगातार जमा होते रहने के कारण डेल्टाओं का निर्माण होना प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे मैन्ग्रोव वनस्पतियों के बनने से लैगून का भूमिकरण होता गया। यही नवनिर्मित भूमि सूखकर निवास योग्य हुई और गांव व शहर बसने लगे। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा स्थापित होने का इतिहास 1000 वर्षों से ज्यादा पुराना नहीं है। हमारा देश 3 दिशाओं से समुद्र से घिरा हुआ है और उसकी समुद्र तट रेखा पश्चिम में पाकिस्तानी सीमा से शुरू होकर गुजरात, कोंकण, मलाबार, कन्याकुमारी होते हुए ऊपर उठकर आंध्र प्रदेश व उड़ीसा से घूमती हुई बंगाल के सुन्दरवन पार करती हुई बांग्लादेश की सीमा में मिलने तक लगभग 5,500 कि.मी. लंबी है। इस संकरे पट्टीनुमा भाग में बालूघाट मडफ्लेटस उबड़-खाबड़ चट्टाने, कोरल रीफ व मैन्ग्रोव वन भरपूर है। इनमें जीवन के सर्वाधिक रूप दिखाई देते हैं। भारत व बांग्लादेश की सीमा पर गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों के मुहानों पर स्थित विश्व का सबसे बड़ा मैन्ग्रोव सुन्दरवन अद्वितीय है। यह लगभग 51,760 वर्ग कि.मी. क्षेत्र फैला हुआ है। भारत में इसका मात्र 4,226 वर्ग कि.मी. क्षेत्र है जहां विश्व के 60 प्रतिशत बाघ पाए जाते हैं। कभी अतीत में कोलकाता महानगरी भी सुन्दरवन का ही हिस्सा रही होगी। कुछ वर्ष पूर्व यहां मेट्रो रेल निर्माण कार्य के लिये भूमिगत खुदाई की गई तो मैन्ग्रोव वनस्पतियों के अवशेष पाए गए थे।
महत्वपूर्ण इकोसिस्टम -
मैन्ग्रोव वनों में विशेष प्रकार के प्राणी निवास करते है। सुन्दरवन में बाघ, हिरण, सुअर, बंदर, लंगूर, लोमड़ी, उदबिलाऊ, सांप, जंगलीबिल्ली, नेवले कई तरह के केकड़े व असंख्य कीड़े मकोड़े, पतंगे पाए जाते हैं। घड़ियाल व कछुए भी बहुतायत मिलते हैं। पक्षी मुख्यतः प्रवासी होते है जो ज्यादातर उत्तरी गोलार्ध की ठंड से बचने व प्रजनन के लिये यहां आते हैं। मैन्ग्रोव कई प्रकार की समुद्री मछलियों के अण्डे देने के क्षेत्र होते हैं। इन वनों में मौजूद वनस्पतियां, प्राणी, मृत व सड़े गले पदार्थ समुद्री जीवों के लिये भांति-भांति के भोजन उपलब्ध कराते हैं। इन प्राकृतिक आवासों में संसार की सबसे चिन्ताकर्षक समुद्री नर्सरी विद्यमान है। आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सादे पानी की मछलियां अपने प्रजनन के लिये डेल्टा क्षेत्र में आती है और शैशवकाल बिताने के पश्चात पुनः नदियों की ओर अग्रसर होकर विकास करती है। ये करीब 1600 कि.मी. यात्रा करती है। यहां मौजूद घड़ियाल व प्रवासी पक्षी भी अपने-अपने क्रिया कलापों से विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। नदियों द्वारा लाए गए मलबे में विद्यमान मृतजीवों का भोजन कर घड़ियाल इन क्षेत्रों में सफाईकर्मी की भूमिका निभाते है। साथ ही बड़ी परभक्षी मच्छलियों को खाकर मत्सियकी को संरक्षण देते हैं। मैन्ग्रोव का प्रत्येक आर्थिक महत्व भी कम नहीं है। जलाऊ लकड़ी का स्रोत होने के अलावा यहां पाए जाने वाले विशिष्ट पेड़ पौधों के माध्यम से शाकाहारी प्राणी अपना आहार (फूल, फल, शहद, साग, चारा आदि) प्राप्त करते हैं। तदोपरांत परभक्षी प्राणियों का शिकार बन प्राकृतिक भोजन श्रृंखला को गतिमान करते हैं। इन जंगलों में अनेक जड़ी बूटियां भी पाई जाती है। यहां पाया जाने वाला रैनिन काफी उपयोगी है। स्पष्ट है कि मैन्ग्रोव वन विश्व में सबसे उत्पादक इकोसिस्टम का अंग है। जो समुद्री भूभाग को उपजाऊ क्षेत्र बनाए रखकर मछलियों व अन्य समुद्री जीवों के विकास में मददगार होने के साथ-साथ समुद्र तटों में मिट्टी के कटाव व इनलैंड सूखे रोकने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
बढ़ रहा है तूफानों का देश
सुन्दरवन जैसे विशाल वेटलैंड प्रदेश पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में भूमिका निभाते हैं जिसका मानव पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ता है लेकिन आर्थिक विकास की अंधाधुंध दौड़ में वनों की कटाई के कारण मैन्ग्रोव प्रदेश की इकोलौजी छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण आन्ध्र, कच्छ, उड़ीसा, बांग्लादेश जैसे क्षेत्रों के प्रति वर्ष समुद्री तूफानों की मार झेलनी पड़ रही है। भारतीय तटरेखा के समीप बंगाल की खाड़ी में प्रतिवर्ष 8-10 चक्रवात आ रहे है जबकि अरब सागर तट पर एक चक्रवात आता है। हमारा पूर्वी तट व बांग्लादेश इन चक्रवाती तूफानों के प्रति संवेदनशील है। सन् 1999 में आए सुपर चक्रवात ने उड़ीसा के तटीय इलाकों में जो तबाही फैलाई थी उससे आज तक उड़ीसा उभर नहीं पाया है। सुन्दरवन को मानव अतिक्रमण के फलस्वरूप काफी नुकसान पहुंच चुका है, खासकर बांग्लादेश वाले भाग में। यही वजह है कि वहां आए दिन समुद्री तूफानी की मार पड़ती है। भारतीय सुन्दरवन भी सिकुड़ता जा रहा है लेकिन बांग्लादेश के मुकाबले यह मानव अतिक्रमण (आबादी 32 लाख) के बावजूद अभी भी सुरक्षित है। विशेषज्ञों का कहना है कि चक्रवाती तूफानों का वेग यहां 60 प्रतिशत कम हो जाता है। यही वजह है कि चक्रवाती तूफानों से प. बंगाल में कम क्षति होती है। मैन्ग्रोव वनों की इकोलौजीगत संवेदनशीलता को देखते हुए भारत सरकार ने 1950 के दशक से ही इनके संरक्षण कार्यक्रमों की ओर ध्यान देना आरंभ कर दिया है। सन् 1972 में सुन्दरवन को बाघ रिजर्व व सन् 1985 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया है ताकि भोजन श्रृंखला के शीर्ष पर स्थित बाघ को समुचित संरक्षण प्रदान किया जा सके। राष्ट्र संघ ने 1977 में सुन्दरवन को विश्व संपत्ति घोषित किया है। फिर पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के अंतर्गत मैन्ग्रोव को संवेदनशील तंत्र घोषित कर इनके दुरुपयोग व अप्राकृतिक दोहर पर रोक लगाई है। यदि मैन्ग्रोव योग्य क्षेत्रों में इन्हें बहाल किया जाए तो समुद्री चक्रवाती तूफानों के साथ-साथ त्सूनामी जैसी आपदाओं की विकरालता को भी कम किया जा सकेगा। अतः मैन्ग्रोव वनों के संरक्षण व प्रसार के लिये मुम्बई हाईकोर्ट ने भी आवश्यक निर्देश दिए हैं। दून दर्पण (देहरादून), 21 Jan. 2006
हिमयुग की आहट है ग्लोबल वार्मिंग
क्या आपने कभी सोचा है कि यदि पृथ्वी का अंत हुआ तो किस तरह होगा? एक झटके में या फिर आहिस्ता-आहिस्ता? यदि कोई बड़ा एस्ट्रायड या धूमकेतु पृथ्वी से टकराता है तो एक झटके में ही पृथ्वी से जीवन का समूल नाश हो जाएगा और यदि तुरंत रोकथाम के उपाय नहीं किए गए तथा ग्लोबल वार्मिंग इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो पृथ्वी से मानव समेत जीवों की सभी प्रजातियां आहिस्ता-आहिस्ता विलुप्त हो जाएगी। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे ने मुख्यतः 1990 के अंतिम महीनों के बाद से दुनियाभर का ध्यान आकर्षित किया है। आइए जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग है क्या?
पृथ्वी पर जीवन को विकसित करने और इसे फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने का काम वायुमंडल करता है। हमारे वायुमंडल में मुख्यतः आक्सीजन और कार्बन डाई आक्साइड जैसी अन्य ‘ग्रीन हाउस’ गैसें विद्यमान हें जो धरती से परावर्तित सूर्य की किरणों के कुछ अंश सोखकर पृथ्वी को गर्म रखती है और अतिरिक्त गर्मी को अंतरिक्ष में विलीन हो जाने देती है। वर्तमान में ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ जाने के कारण यह प्राकृतिक चक्र गड़बड़ा गया है। ग्रीन हाउस गैसें यदि अत्यधिक बढ़ जाएंगी तो न केवल पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश ही पहुंचना कम होता जाएगा, बल्कि पृथ्वी से परावर्तित सूर्य की किरणें और अतिरिक्त गर्मी भी वायुमंडल से बाहर नहीं जा सकेगी। इस स्थिति में पहले तो पृथ्वी का तापमान बढ़ता चला जाएगा और उसके बाद सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में न मिलने के कारण पृथ्वी तेजी के साथ ठंडी होने लगेगी और हिमयुग आ जाएगा। यह एक ऐसी स्थिति होगी जिसमें मानव, पेड़-पौधों व जानवरों समेत जीवन का प्रत्येक स्वरूप विलुप्त हो जाएगा। पृथ्वी का जैविक इतिहास बताता है कि बीते 50 करोड़ वर्षों में छह ऐसी घटनाएं घट चुकी है जब पृथ्वी से ज्यादातर जीव प्रजातियां लुप्त हो गई। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हम अब सातवीं बार पृथ्वी से जीवन विलुप्त होने के डर के साए में जी रहे है।
फिल्म ‘द डे आफ्टर टुमारो’ में निर्देशक रोनाल्ड एमेरिक ने ग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक स्वरूप से लेकर हिमयुग के आगमन तक की स्थिति दर्शाई है। दूसरी ओर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को लेकर शीर्ष मौसम व भू विज्ञानियों और राजनीतिज्ञों के बीच एक अलग बहस चल रही है और इस बहस का कारण है पेटागन की एक रिपोर्ट। यह रिपोर्ट अमेरिका के समक्ष उत्पन्न होने वाले दीर्घकालीन खतरों को भांपने व उनका आंकलन करने का काम करने वाले पेंटागन के एक वरिष्ठ सदस्य एंड्रयू. डब्लू. मार्शल के दो सलाहकारों द्वारा ‘एन एबरप्ट क्लाईमेंट चेंज सिनारियो एंड इट्स इम्प्लीकेशंस फार यूनाईटेड स्टेट्स नेशनल सिक्योरिटी’ शीर्षक से लिखी गई है। मार्शल का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से संबंधित यह रिपोर्ट उन्होंने पिछले वर्ष देश के शीर्ष वैज्ञानिक सलाहकार केंद्र नेशनल एकेडमीज आफ साइंस के इसी विषय पर एक अध्ययन को पढ़ने के बाद तैयार करवाई है। नेशनल एकेडमीज आफ साइंस ने अपने अध्ययन में ग्लोबल वार्मिंग के प्रति स्पष्ट चेतावनी देते हुए इसे मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर खतरे के रूप में चिन्हित किया है। पेंटागन की यह अतिगोपनीय रिपोर्ट मीडिया में कैसे लीक हो गई? यह एक अलग रहस्य है, बहरहाल ब्रिटेन का एक समाचारपत्र ‘द आब्जर्वर’ इस पर टिप्पणी करते हुए लिखता है, ‘पेंटागन ने इस रिपोर्ट द्वारा बुश से कहा है कि वातावरण में हो रहे बदलाव अंततः हमें नष्ट कर देंगे।’ पेंटागन की गोपनीय रिपोर्ट में ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों के तौर पर प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही शहरों में अराजकता और नाभिकीय युद्ध तक की स्थिति उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है। उधर कुछ पर्यावरणविदों और विज्ञानियों का मानना है कि पैंटागन की इस रिपोर्ट और रोनाल्ड एमेरिक की फिल्म से आम लोगों में ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए जागरूकता बढ़ेगी। वहीं कुछ विज्ञानियों का मानना है कि इस रिपोर्ट से और कुछ हो या न हो विकासशील देशों के विरुद्ध बुश प्रशासन के हाथ ग्लोबल वार्मिंग नाम का एक नया हथियार जरूर लग गया है। पेंटागन के श्री मार्शल के लिए एक लाख डालर की ग्रांट के बदले यह रिपोर्ट लिखने वाले उन दो सलाहकारों में से एक पीटर श्वार्टज का कहना है कि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में जानबूझकर सबसे बदतर स्थितियों का जिक्र किया है। वह कहते हैं कि मेरा लक्ष्य सैन्य रणनीतिज्ञों को उस परिस्थिति के बारे में सोचने के लिए मजबूर करना था जिसकी कल्पना करना भी कठिन है। रोनाल्ड एमरिक की फिल्म में तो इससे भी कहीं आगे की स्थिति दिखाई गई है। फिल्म डे आफ्टर टुमारो का मुख्य पात्र एक पेलियो क्लाईमेटोलाजिस्ट (भूतकाल में मौसम में हुए बदलावों का अध्ययन करने वाला विज्ञानी) प्रो. एड्रियन हाल है जिनकी मुख्य चिंता ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्पन्न होने वाली बदतर स्थितियों से इस दुनिया को और अपने बेटे सैम को बचाना है।
खतरनाक दौर में जलवायु - भारत डोगरा
पिछले दिनों भारत के अनेक शहरों से सर्दी के पुराने रिकार्ड टूटने के समाचार मिले। उधर, चीन ने 20 वर्षों में अपनी सबसे भीषण सर्दी का मौसम भी इस वर्ष ही घोषित किया। कुल मिलाकर एशिया के एक बड़े भाग से भीषण शीत-लहर के समाचार मिले हैं पर इसमें एक अलग ही सच्चाई है कि आस्ट्रेलिया में 2005-06 को पिछले 95 वर्षों में सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया। पिछले 105 वर्षों में सबसे कम वर्षा आस्ट्रेलिया में इस वर्ष हुई। विश्व स्तर पर वर्ष 2005 को पिछले 145 वर्षों में दूसरा सबसे गर्म वर्ष माना गया। इस वर्ष आकर्टिक सागर में जितनी बर्फ पिघली उतनी पहले कभी नहीं। इतना ही नहीं, इस वर्ष अटलांटिक महासागर में 27 ट्रापिकल तूफान दर्ज किए गए, जो अपने में एक रिकार्ड है।
वर्ष 2005 में मौसम में जुड़े हादसों के बारे में अनुमान लगाया गया कि इनमें 200 अरब डालर की हानि हुई, हालांकि कुछ लोग इससे अधिक क्षति भी बता रहे हैं। दूसरे शब्दों में हर तरह का प्रतिवादी मौसम वर्ष 2005 में तथा इस वर्ष के आरंभिक दिनों में देखा गया। यह प्रवृत्ति इससे पहले के कुछ वर्षों में भी देखी गई थी। वर्ष 2003 में एक अभूतपूर्व घटना देखी गई कि यूरोप विशेषकर फ्रांस में गर्मी की लहर या हीट वेव में हजारों लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर वृद्ध थे। उस समय इस हीट वेव में बीस हजार लोगों के मरने की बात स्वीकार की गई थी, पर न्यूजवीक पत्रिका ने पिछले वर्ष अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि इस हीट वेव में यूरोप में मरने वाले लोगों की संख्या चालीस हजार तक पहुंच गई थी। विख्यात पत्रिका साइंस में कुछ समय पहले समुद्री तूफान हरीकेन पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया। इसमें बताया गया है कि लगभग 35 वर्ष पहले अधिक उग्रता वाले श्रेणी 4 या 5 के तूफान कुल तूफानों के मात्र 20 प्रतिशत थे, जबकि हाल के समय में यह कुल तूफानों के 35 प्रतिशत हो गए हैं। दूसरे शब्दों में हरीकेन की विनाशक क्षमता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। ये सब जानकारियां एक-दूसरे से अलग नहीं है और न ही उनमें कोई विरोधाभास है। जलवायु बदलाव की चेतावनियां देने वाले वैज्ञानिक लगभग 15 वर्षों से तो ऐसी चेतावनियां देते ही रहे हैं कि हर तरह के प्रतिवादी प्रतिकूल मौसम की संभावना है। इस भविष्यवाणी के अनुकूल ही रिकार्ड गर्मी भी दर्ज हो रही है और रिकार्ड सर्दी भी। कहीं भयानक बाढ़ व तूफान है तो कहीं भीषण सूखे की स्थिति। जलवायु बदलाव को विकास के मुद्दे से जोड़कर अभियान चलाने वाली पश्चिमी देशों की 21 संस्थाओं ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में बताया है कि इस कारण सबसे गंभीर स्थिति अफ्रीका में है, जहां वर्षा चक्र गड़बड़ाने के कारण वर्षा आधारित खेती पर निर्भर 70 प्रतिशत लोग गंभीर स्थिति में है। सबसे अधिक चिंताजनक तो कई विशेषज्ञों की यह अपेक्षाकृत नई चेतावनी है कि मात्र 20 वर्षों में ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। यह स्थिति तब होगी जब वायुमंडल में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा 400 पी.पी.एम. (पार्टस पर मिलियन) तक पहुंच जाएगी। औद्योगिक क्रांति से पहले यह गणना 280 पी.पी.एम. तक थी और उसके बाद पता ही नहीं चला कि कब यह बढ़ती हुई 370 पी.पी.एम. तक पहुंच गई। इस समय कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन की स्थिति देखते हुए अनुमान हे कि यदि इसे कम करने के सफल प्रयास नहीं हुए तो 20 वर्ष में यह 400 पी.पी.एम. तक पहुंच जाएगी। तब जलवायु बदलाव की समस्या को नियंत्रित करना आज की अपेक्षा कहीं अधिक कठिन हो जाएगा। यह इतनी गंभीर समस्या है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसके प्रति अपेक्षित चिंता नहीं प्रदर्शित की जा रही।
जब हम विश्व स्तर के नेतृत्व को देखते है कि वे इस बारे में क्या कर रहे हैं तो मन दुःख और चिंता से भर जाता है। वास्तव में केवल चिंता करने भर से काम नहीं चलेगा। चूंकि यह संकट सारी धरती का है अतः सभी को इस बारे में सोचना होगा कि वह अपने स्तर पर इस सबसे बड़े पर्यावरणीय संकट को कम करने में क्या भूमिका निभा सकता है? जलवायु बदलाव का संकट ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जुड़ा है और आगे इसका मुख्य कारण फासिल ईंधनों की अधिक खपत है। प्रायः यह स्वीकार किया जाता है कि आम नागरिक तेल की खपत की कम कर या तेल को बचाकर जलवायु बदलाव के संकट को कम करने में अपना योगदान दे सकते हैं। यह अपनी जगह पर सही सोच है पर इसे और व्यापक बनाना चाहिए। आधुनिक अर्थव्यवस्था में लगभग सभी उत्पादों को बनाने में फासिल ईंधन विशेषकर तेल की खपत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से होती है। केवल तेल की खपत कम करना पर्याप्त नहीं है, अपितु पूरी जीवन-शैली को सादगी की ओर ने जाना जरूरी है। पश्चिमी देशों के जलवायु बदलाव के संकट को कम करने के प्रयासों में यही भूल कमी है कि वे जीवन शैली को बदलने व उसे सादगी की ओर ले जाने के महत्व को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। यदि हम अपने देश से यह संदेश एक महत्वपूर्ण आंदोलन या अभियान के रूप में भेज सकें तो उसका असर विश्व स्तर पर भी हो सकता है, क्योंकि बुनियादी सच्चाई यही है कि सादगीपूर्ण जीवन मूल्य अपनाएं बिना पर्यावरण और विशेषकर जलवायु बदलाव का संकट हल नहीं हो सकता। इसके साथ ही सबसे गरीब व कमजोर वर्ग की सहायता के लिए भी और सक्रिय होने की जरूरत है। वैसे तो प्रतिकूल मौसम सबको प्रभावित करता है, पर इसका सबसे विकट असर उन पर पड़ता है जो सबसे गरीब व कमजोर वर्ग के हैं। यदि शीत लहर भीषण है तो उसका भी सबसे बुरा असर बेघर लोगों पर पड़ता है और यदि गर्म हवाएं चल रही हैं तो इसका शिकार भी आश्रयविहीन गरीब लोग सबसे पहले बनते है। समुद्री तूफान हो या बाढ़, झोपड़ीवासियों का जीवन सबसे अधिक खतरे में पड़ता है। इसलिए जलवायु बदलाव व प्रतिकूल मौसम के दौर में नए सिरे से गरीब व कमजोर वर्ग की समस्याओं की महत्व देना होगा और उन्हें हल करने के लिए असरदार कदम उठाने होंगे। सरकार को तो अपनी नीतियों की दिशा निर्धन व कमजोर वर्ग के पक्ष में करनी ही चाहिए, नागरिकों को भी अपनी ओर से इस कार्य में भरपूर सहयोग देना चाहिए। उदाहरण के लिए सरकार व नागरिकों में परस्पर सहयोग से एक बहुत सार्थक अभियान यह हो सकता है कि सब छोटे-बड़े शहरों में आश्रय स्थल बनाएं जाएं। इन आश्रय स्थलों में किसी भी समय जरूरतमंद लोग शरण लेकर प्रतिकूल मौसम से अपना बचाव कर सकें। जहां तक सरकारी नीतियों का सवाल है तो उनमें पर्यावरण रक्षा व निर्धन वर्ग की सहायता पर कहीं अधिक ध्यान देना चाहिए। सरकार को अपनी योजना में इस ओर भी ध्यान देना होगा कि जलवायु बदलाव के इस दौर में उसकी मशीनरी गंभीर आपदाओं व प्रतिकूल मौसम के लिए कहीं अधिक तैयार रहे।